« »

“जीवनदर्शन”

0 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 5
Loading...
Uncategorized

पंचतत्वों का बना शरीर बोलो कबतक साथ निभाएगा,
कर्मों को भोग यह पुनः पंचत्त्वों में विलीन हो जाएगा.

ईश्वर तो है कारीगर सबसे बडा,
मिट्टी के तन का सुंदर ढाँचा गढा.
रक्त,धमनियों का जाल बिछाया,
हड्डियों, मांस का फिर लिया सहारा,
त्वचा की परत से फिर इसे लेपा,

सारे अंगों को जोड,निर्मल सा मन दिया.
देकर जीवन हमें मोहजाल में ढकेल दिया.

माँ की छत्रछाया तले,
गर्भ में जबतक थे पले.
दुनिया में कदम रखते ही,
रिश्तों का ऐसा डोर बंधा.
भाई,बहन,चाची,चाचा,
हर कोई फिर हमसे जुडा.
जीवन के सफर मे,चलता रहा रिश्तों का सिलसिला.
मोहमाया के जाल में निर्मल मन भी युं ही फँसता गया.

माता पिता के लाड-प्यार संग,
पुर्ण हुई शिक्षा और संस्कार.
काबिल बन खडे अपने पैरों पर,
सुख-दुख का ऐसा ढोंग रचाया.
मन चंचल बन झुकने लगा,
तब हमसफर संग ब्याह रचाया.

पल-हरपल वक्त चलता ही गया.
प्रतिपल नश्वर तन भी क्षीण होता ही गया.

करने लगा उसी तरह अपने बच्चों की परवरिश,
बनाया उन्हें भी काबिल लेकर बडों का आशिष.
बच्चों का ब्याह रचाया,उनकी नई दुनिया बसाया,
अपने फर्ज से निपुर्णफिर् उसने भी गंगा नहाया.

खुशियों गमों का बस चलता रहा कारवाँ.
सुख की चाह लिए दुख के सागर में डूबता गया.

झुठे हैं सारे रिश्ते नाते,
झुठे हैं सारे क्रियाकलाप.
महज दिखावा है यह जिंदगी,
धन दौलत भी हैं मात्र छलावा,
मात्र बनावट है यह सुंदर काया,

झुठे संसार में है सच्चा केवल अंतर्मन हमारा.
मन के मैलों धो जब हमने इसे निहारा.

वक्त का पहिया चलता गया,
क्षण क्षण शरीर का क्षरण होता गया.
इसी तन से था जुडा रिश्तों का धागा,
वक्त के चलते यह भी कमजोर हो चला.
टुट गया सारे संसार से रिश्ता नाता,
आजाद् हो चली शरीर से जब आत्मा.

जबतक है हममें जान तबतक हैं हम इंसान.
मात्र एक लाश हैं हो जाएँ जब हम बेजान.

पंचतत्वों का बना शरीर बोलो कबतक साथ निभाएगा.
कर्मों को भोग यह पुनः पंचत्त्वों में विलीन हो जाएगा.
राजश्री राजभर…….

5 Comments

  1. Upender says:

    Good one!!!

  2. Vishvnand says:

    बहुत सुन्दर, भावनिक और अर्थपूर्ण रचना,
    बहुत मनभायी, हमारी आपको हार्दिक बधाई .
    सच है, ये तो सब प्रभु का रचा माया का जंजाल है,
    इसे समझ, अपने मन को बनाना शक्तिमान न कि कंगाल है…

  3. parminder says:

    वाह बहुत सुन्दर ढंग से मानव शरीर के विभिन्न पहलुओं को दर्शाया है | कुछ इसी तरह की मैंने कुछ दिन पहले “वाह री कुदरत ” मैंने पोस्ट की थी कृपया पढ़ कर देखें |

Leave a Reply