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…और मैं बुरा बन गया !
कल तक मैं था सबका प्यारा, रहता आँखों का तारा बनकर |
ना जाने ये कैसी हवा चली है, कि रह गया मैं सबसे बुरा बनकर ||
एक सुबह ऐसी थी आई, जिसमें हुई एक नई शुरुआत,
एक पल में ही सब कुछ चला गया, ना जाने कैसी थी वो रात |
रात वो हँसकर चली गयी, बस रह गया था सन्नाटा थम कर,
ना जाने ये कैसी हवा चली है, कि रह गया मैं सबसे बुरा बनकर ||
मेरे भी कुछ दोस्त हुए थे, जो करते थे मुझ पर विश्वास,
एक दिन वो भी साथ उठेंगे, उनको रहती थी ये आस |
पर मुझको जब से हार मिली है, रह गया हूँ तन्हा सा रहकर,
ना जाने ये कैसी हवा चली है, कि रह गया मैं सबसे बुरा बनकर ||
अपने-अपने बन कर सब, रहते थे मेरे पासम-पास,
ममता और प्रेम का अनमोल सा आँचल, मुझ पर रहता था कुछ ख़ास |
जिस आँचल में सोता था कभी, आज चुभता हूँ उसी में काँटा बनकर,
ना जाने ये कैसी हवा चली है, कि रह गया मैं सबसे बुरा बनकर ||
एक दिन नया सवेरा कहीं से, आएगा मेरे भी पास,
फिर से खिलेगी मुस्कान जुबां पर, फिर से जमेगा सब पर विश्वास |
उस दिन मैं सब को दिखला दूँगा, अपनी सच्चाई जम कर,
और शायद उस दिन के बाद से, मैं ना रहूँगा कभी बुरा बनकर ||
“श्री भैरव जी की जय”
6 Comments
Bahut sunder swapnesh ji…
i loved it swapnesh…quite sensitive.keep it up
Swapnesh Tiwari Reply:
December 29th, 2009 at 4:37 pm
@prachi, Thank you sooo much for your appreciateion, i will surely keep it up
Thank you once again…

Hi, My name is Swapnesh (You must have heard it)
Kisi ki aankhon ka KAJAL to kisi ke bikhre KESH hoon...
Ji Haan, Main koi Swapn nahin, Swapnesh hoon... :)
acche vicharonwali, jeewan ko nayee aashayen denewali,ye kavita aur bhi achchhi ban sakti thi agar isme thoda sa meetar ka khyal rakha jata.yah kavita gungunane me kuchh rukawat paida karti hai.phir bhi hamesha ki tarah tum apne spashtwadi vicharon ko kahne me kamyaab rahe ho.” chalo ban jaye kela”jaisi katakshon se laba lab rachna koi phir se likho,padhne me aur bhi maza aayega.
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Swapnesh Tiwari Reply:
December 29th, 2009 at 4:34 pm
@C K goswami, आपका सुझाव सर आँखों पर,
मैं अपनी अगली कविता को लिखते समय आपके इन सुझावों का ज़रूर ध्यान रखूँगा…
मेरी कविता को सराहने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद
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