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अमृत प्यार
अमृत प्यार
माँ के प्यार की महिमा का, करता हूँ गुणगान,
कभी कमी न प्यार में होती, कैसी है यह खान .
कष्ट जन्म का सहती है, फिर भी लुटाती जान,
सीने से चिपकाती है, हो कैसी भी संतान .
छाती से दूध पिलाती है, देती है वरदान,
पाकर आंचल की छांव, मिलता है सुख बड़ा महान.
इसके प्यार की महिमा का, कोई नही उपमान,
अपनी संतति को सुख देना ही इसका अरमान .
अंतस्तल में भरा हुआ है, ममता का भंडार,
संतानों पे खूब लुटाती, खत्म न होता प्यार .
ले बलाएं वह संतति की, दे खुशियों का संसार,
छू न पाए संतानों को, कष्टों का अंगार .
दुख संतति का आंख में बहता, बन कर अश्रुधार,
हर लेती वह पीड़ा सुत की, कैसा हो विकार .
संकट आएं कितने भारी, खुद पर ले हर बार,
भाग्य बड़े हैं जिनको मिलता, माँ का अमृत प्यार .
Kavi Kulwant Singh
4 Comments
अति सुन्दर ! कितना वास्तविक चित्रण किया है ! माँ जैसी भी हो, अपनी संतान से बढ़ कर कुछ नहीं उसके लिए |
Very meaningful poem indeed.
Totally second parminder ji’s comment about and arising on reading the poem.
Maa ki mahanta ka badi hi sundarta se varnan kiya hai aapne…..
Ji haa Maa ke liye bete se badhkar kuchh nahi hota…..

Working as a Scientific Officer at BARC, Mumbai.
B. Tech., Silver Medallist from IIT
Poetry is my love / my hobby/
Perform at stages / kavi sammelans
Quiz Master/ Science quiz/ Conduct and organise live science quiz in Hindi
सचमुच सर…..yesa ही होता है माँ का प्यार… रचना bahut sunder है…..
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