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लत -जिल्लत

लत -जिल्लत

खूब पियो सिगरेटें बीडी ,फिर ना मिलेगा ये मौका
फिर ना मिलेगा मानव जीवन ,जो सेवन इनका रोका
जो पीने की चीजें बनाई,उनसे क्यूँ परहेज करो
गांजा चरस नशीली दारू ,पीने से क्यूँ तुम्ही डरो
जीवन में अफ़सोस ना होगा ,गर इनका उपयोग किया
ख़ुशी ख़ुशी जीवन जीलोगे ,बढचढ कर उपभोग किया
धिक्कारेगी नहीं आत्मा,तुम पर गर्व करेगी वो
असली मानव कहेगी तुमको ऐसी लत अपनाई जो

घर में चोरी कभी ना होगी ,खांसी तुमको आएगी
रात रात  भर तुम जागोगे ,बत्ती बुझ ना पायेगी
रोज शाम कोघर में अपने ,खोलोगे जब बोतल तुम
बीबी आलस त्यागेगी और हुकम बजाएगी हरदम
कालोनी में धाक जमेगी ,दादा तुम कहलाओगे
यार दोस्त का जमघट होगा,ख्याति तुम फैलाओगे
नहीं किसी की हिम्मत होगी,आँख उठाकर देखेगा
बहन और बेटी जहां भी घुमे,नहीं उन्हें कोई छेड़ेगा

फिक्र करें हम कल की क्यूँ,जब आज सुनहरा अपना है
ज्ञानी मुनि संत क्या जाने ,यही तो जीवन सपना है
गांजा चरस हशीश हेरोइन जब भी इस्तेमाल हुवा
दुनिया के संकट को भूला, पी के  जो  बेहाल हुवा

क्या महंगाई,कहाँ नौकरी कैसी जिम्मेदारी है
दूर हो गयी विपदा सारी ,नशे से जिसकी यारी है
केंसर से चाहे सड़े फेफड़े,घायल होवे आमाशय
पीते रहना नशे की चीजें ,मरने से अब कैसा भय
मरना तो सबको है इक दिन,फिर जैसे जी  चाहे  मरें
नहीं चाहिए  हमें मशवरा ,कितना डराए हम क्यूँ डरें

तर्क सुने लत के  मारों से,अब  सोचे  परिवार की हम
पीके क्यूँ सिगरेट व बीडी , बिना मौत मरते हो तुम
केंसर  को क्यूँ पास बुलाते क्यूँ करते यारी उससे
देखके टीबी दोस्त भगेंगे ,यारी पालोगे किससे
किसके सहारे बीबी बच्चे,जल्द छोड़ कर जाओगे
कौन करेगा लालनपालन,क्या भीख उन्हें मंगवाओगे
तनिक मौज  की खातिर  करना ,अपनों पे क्यूँ अत्याचार
करके हानि तन धन की,क्यूँ तोड़ रहे अपना परिवार
नशे ने सबका नाश कियाहै ,पनप नहीं कोई पाया
घुन बन तन का ह्रास किया और संचित धन को लुटवाया
छोडो तर्क ,मत करो प्रशंसा  नशे की लत को तुम छोडो
जीवन है अनमोल धरोहर,व्यर्थ काम से मुह मोड़ो

———————सी के गोस्वामी(चन्द्र कान्त)जयपुर

17 Comments

पहले
कुतर्कों से नशीले पदार्थों के सेवन की प्रेरणा और फिर इन नकारात्मक तर्कों पे सकारात्मक सन्देश देकर नशा विरोध करना ,बहुत ही सुन्दर तरीके से वर्णित किया है .कवि के प्रयास को सराहा जा सकता है . इस तरह की रचनाएँ समाज को सन्देश का कार्य करती हैं

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c k goswami Reply:

@basant tailang bhopal, dhanyawad बसंतजी.

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A very articulate meaningful but lighthearted humorous poem of effective enlightenment to involve and educate the masses on evils of the vices that are indulged in to the detriment of the family & society and provoking them for wisdom to give up these habits/culprits.

A very commendable Hindi poem, deserving of profound appreciation. Chandrakant ji, Kudos to you

एक बहुत सराहनीय हिन्दी कविता, गहन प्रशंसा पात्र

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c k goswami Reply:

@Vishvnand, सदैव की bhaanti आपकी टिपण्णी ने मुझे फिर से प्रेरणा दी है की main कुछ और भी समाज के लिए संदेशात्मक कविता likhun.धन्यवाद्.

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Bahut sunder rachna aur utna hi sunder sandesh.

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c k goswami Reply:

@Ravi Rajbhar, धन्यवाद् रविजी.

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no words for such a nice poem with burning problem of society -badhaaee.sir

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c k goswami Reply:

@sushil sarna, आपकी sarahna के लिए ह्रदय से धन्यवाद् .

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Lajawab…!
Behtarin rachna hai sirji…….

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c k goswami Reply:

@dr.paliwal, डाक्टर साहिब आपको रचना पसंद आयी,शुक्रिया.

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rachna me sacchai v manbhavak chatran ki gayi hai
aur padne pe mano chitra samne ate ho
badhai

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rajdeep Reply:

@rajdeep, sath me ek accha sandesh bhi, is kavita ko poorna bana rahi hai

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c k goswami Reply:

@rajdeep, rajdeepji ,आप जैसे कवियों की जब सकारात्मक टिपण्णी मिलती है तो दिल खुश ho जाता है.

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अत्यंत ही सुन्दर समंवेदनशील रचना है ! गहन कटाक्ष दर्शाती हुई एवं शिक्षा-
प्रद सन्देश देती हुई सर्वश्रेष्ट रचना ! ५-सितारे और वांछित हैं !

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c.k.goswami Reply:

@ashwini kumar goswami, रचना को सम्मान के साथ सराहने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद्.

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चंद्रकांत जी, इस सुन्दर संदेशात्मक रचना के लिए बधाई.

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c k goswami Reply:

@Raj, dhanyawad.

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