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मैं “प्यार” हुं

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हमने प्यार को तडपते देखा है,
किसी को पाने को दिन रात रोते देखा है,
जुदा होकर हरपल तडपकर मरते देखा है.
लोग कहते हैं हम आपसे प्यार करते हैं,
हम कहते हैं वो इसका अर्थ भी न समझते हैं.
मतलब की खातिर कोई प्यार जताए ,
उसे प्यार नहीं स्वार्थीपना कहते हैं.
प्यार तो सदा खुशियां देना जाने,
जान देकर भी उसकी इज्जत बचाना जाने.
पर यहां मतलबी दुनिया तो देखो,
अपनी खुशियां और जिद की खातिर,
प्यार को बदनाम करते देखा है.
उसे रोता-बिलखता छोड ,
उसपर हंसाते और हंसते देखा है.
नफरत है हमें ऐसे लोगोँ से ,
जो फिर भी कहते हैं हमें तुमसे मोहब्ब्त है.
न चाहते हुए भी उनपर यकीं करना पडता है,
है ये कलयुग, इस कलयुग के जाल में खुद को फँसते देखा है.
प्यार शब्द का अर्थ भी कम हो जाता है,
जब उनके मुंह् से इसका जिक्र भी होता है.
हाँ मै प्यार हुं, मैने अपनी बेइज्ज्ती सरेआम होते देखा है,
मैनें खुद् को सरेआम बिकते देखा है.
पर इन लोगो के बीच ही अब मुझे रहना है,
इनसब के बीच मैने अपना अस्तित्व कम होते देखा है,
मुझे मारकर नफरत को कम होते देखा है,
हाँ मैने खुद को मरते, दम तोडते देखा है………..
राजश्री राजभर.

10 Comments

  1. Ravi Rajbhar says:

    Bahut sunder, itani vedna hai shabdon me…..dil hilya diya !
    waise aajke pyar ka roop kuchh aisa hi hai…!

  2. Vishvnand says:

    बहुत खूबसूरत अर्थपूर्ण रचना.
    बहुत मनभायी….
    सच, आज प्यार एक व्यापार ही है,
    और जबसे प्यार व्यापार बना है,
    प्यार सबकुछ है पर प्यार नहीं है

  3. vmjain says:

    vaastav mein pyaar apne maayne kho chuka hai. Is bhaav ko jagaane ke liye badhaai.

  4. dr.paliwal says:

    Bahut sundar rachna hai…..

    Mere vicharon me jo bikta hai vah pyar nahi pyar ki “khal” me kuch aur hai…. jaise sher ki khal me bhediya….

    Jo sachchha pyaar hai vah bikta hi nahi….

  5. rajdeep says:

    loved it

  6. हाँ मै प्यार हुं, मैने अपनी बेइज्ज्ती सरेआम होते देखा है,
    मैनें खुद् को सरेआम बिकते देखा है.
    पर इन लोगो के बीच ही अब मुझे रहना है,
    इनसब के बीच मैने अपना अस्तित्व कम होते देखा है,

    राज श्री जी अफ़सोस है की आपने इस पंक्ति में जीन बातो का जिक्र किया है उनके बारे में सोचने वाला कोई नहीं है क्योंकि हमारे देश के धार्मिक प्यार को पश्चिमी सभ्यता पूरी तरह से निगल चुकी है |
    उमीद है अगर यु ही आप अपनी प्रयास जरी रखे तो हमारे जैसे नवयुअक आपके इस पंक्ति को जिंदगी के आखरी मुकाम तक पहुंचाते रहेंगे ताकि हमारे आने वाली पीडी अपनी इज्जत और मर्यादा को बचा सके |
    अरविन्द सिंह सोलंकी और मंतोष कुमार राजभर
    सिवान बिहार

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