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प्रेरणा का पुल

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Hindi Poetry

ऐसा नहीं है की मैं लिखना नहीं चाहती

पर चाहने और लिखने  के बेच जो

प्रेरणा का पुल बंधा हुवा है

उसे पार करने से डरती हू

 

वोह कहते है ना –

‘सोच’ कभी हकीकत में बदल जाती है

छोटी सी चिंगारी भी आग लगा जाती है

उस आग के  परिणाम  से डरती हू

 

ये उची दीवार देख रहे हो?

बहुत मेहनत से खड़ी की है

दीवार के आड़ में बैठी

प्रेरणा को कूट-कूट कर

आग में कई बार जल-जल कर

मैं लिख रही हू-

 

“तुम्हे”

“मुझे”

“हमे”

 

कहीं तुम देख न लो….

 

—————————-

I guess I had to re-start, somewhere 🙂

12 Comments

  1. naveen says:

    preeti ji,
    aapne jo prerna ka pul poem likhi hai wo bahut bahut bahut sunder rachana hai..last ki panktiya…tumhe’ mujhe’……’hame”” dil ko chhune wali hai…
    naveen

  2. Vishvnand says:

    Beautiful lovely poem. Liked very much
    This is like a classic opening six, when you are now back at the crease after quite a gap & announcing ” मेरी प्रेरणा का पुल अब बन कर तैयार है आपके लिए ”
    It shows you are now back in form like Sehwag , so what is the wait for Best wishes & congrats

  3. Ravi Rajbhar says:

    Welcome Back Preeti ji……
    Realy bahut hi sunder aur bhawpurn kavita….mujhe lagta hai BEECH ki jagah BECH ho gya hai…..ise edit kar len.
    rachna ka shirshak bahut achchha hai…..aur han pls aaplog itne dino tak chhod ke na jaya kijiye..!

  4. dr.paliwal says:

    Prerna ke pul par jo shul the hat gaye hai,
    intjar ke jo din the ab kat gaye hai,
    p4p ki patri par aap raftar le rahi hai,
    lambe antaral ke baad wali yah rachna,
    pahle se bhi jada maja de rahi hai….

  5. medhini says:

    Aek choti sunder kavitha,
    Glad to see you here after
    a long break.

  6. Parespeare says:

    a beautiful poem

  7. rajdeep says:

    believe me its marvelous

  8. ANUJ SRIVASTAVA says:

    nice one

  9. Narayan Singh Chouhan says:

    प्रीतिजी ,गुस्ताखी माफ़ करे ……. आपको इमेल के लिए धन्यवाद मेरी प्रोफाइल तो बन गई परन्तु कविता पोस्ट नही कर पा रहा हु // अपनी एक कविता भेज रहा हु/
    — प्रेरणा —
    हमसे भी ,
    आप से भी ,
    प्रेरणा ली जा सकती है कही से भी //
    सोने से जगाने तक ,
    जागने से सोने तक ,
    जो कुछ भी घटता है /
    वह हर पल ,
    आज भी और कल ,
    प्रेरणादायक रहता है /
    प्रेम दया हिंसा ,करूणा से भी //
    प्रेरणा ली जा सकती है कही से भी //
    ये गुरु ये गोविन्द ,
    प्रेरणा के मानिंद ,
    हमारे आसपास रहते है //
    ये बाग ये फुल ,
    ये चुभते हुए शूल,
    याद कुछ खास रहते है //
    देत्याकर पहाड़ या नदी से भी //
    प्रेरणा ली जा सकती है कही से भी //…..

  10. कल 20/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

  11. अच्छी प्रस्तुति …. बेच की जगह बीच कर लें ..

  12. अच्छी प्रस्तुति …. बेच की जगह बीच कर लें ..

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