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शांति गीत

गीत क्या गाऊँ मैं,

बोल छोड़ गए हैं मुझे अकेले,

आवाज भी खो गई है

इस दुनिया के निर्मम मेले में ।

थाह पाएगी कैसे

यह दुनिया मेरे मन की,

सुन पाएगी कैसे

धड़कन यह मेरे दिल की ।

डूब गई है इंसानियत

क्रूरता के सागर के बीच,

दब गया है संगीत

इस शोर-शराबे के बीच ।

मुस्काएँगीं फ़िर कलियाँ

इस सूखे चमन में,

लहराएगी फ़िर हरियाली

इस बंजर भूमि पे

सींचेगा इसे जब कॊई

ममता के पानी से,

बाँधेगा इसे जब कॊई

प्यार की डोर से ।

बिखेरेगा सूर्य चहूँ ओर

अपनी कोमल, कपोल किरणें,

लहराएगी शीतल यह चाँदनी

इस विशाल नील गगन में ।

स्थापित होगा हर जगह

तब खुशियों का साम्राज्य,

गूँज उठेगा हर तरफ़

अमृत-सा मधुर शांति गीत !

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