निंदिया तू मुझसे दूर क्यों है
निंदिया तू मुझसे दूर क्यों है
निशा की इस बेला वेदी में
जग सारा तेरी गोदी में
पर मेरी स्वप्निल अंखियों में
जीवन स्पंद थमा क्यूँ है
निंदिया तू मुझसे दूर क्यूँ है
जग सोये पर मैं जागूं
मन से भी अपने न भागूं
नैनों में भरी ये प्रीत मेरी
तुझको बैरी लागे क्यूँ है
निंदिया तू मुझसे दूर क्यूँ है
मन का पंछी यादों का गगन
है दूर अभी मेरा वो चमन
पर मेरी बोझिल अंखियों से
तू अब तक रूठी क्यूँ है
निंदिया तू मुझसे दूर क्यूँ है
संसार व इसके संस्कार
मुझे दिखाएं क्यूँ मंझधार
साथी मेरा है उस पार
जलधार मुझे रोके क्यूँ है
निंदिया तू मुझसे दूर क्यूँ है
निंदिया तू मुझसे दूर क्यूँ है
5 Comments
छंद , गेयता और जिसे उर्दू में वज़न कहते हैं उसका नितांत असंतुलन नज़र आता है .भावोद्रेक के भंवर में कविता की नाव संतुलान्विहीन हो गयी लगती है . छंद का ध्यान अथवा पूर्णत: छंदमुक्त रचना करना उचित रहेगा . गीत तो छान्दसिक संतुलन की मांग करता है मित्र -एस एन सिंह


सुन्दर सी मीठी सी कविता,
मनभावन. रचना के लिए बधाई
सुनकर नदिया जरूर कहेगी, ” मैं दूर कहाँ ?”
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pku31in Reply:
November 29th, 2009 at 2:47 pm
@Vishvnand, विश्व्नंदजी….आपका बहुत बहुत हार्दिक आभार.
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