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उसकी आँखों को ही चल राह का तारा कर लें

हम न मिलने कि सजा उससे गवारा कर लें

इससे बेहतर है कि जीने से किनारा कर लें

 

दर्द के तुख्म, जो सोये थे, जगे पड़ते हैं

 गम के मौसम का भला कौन सा चारा कर लें

 

 कोई असबाबे तसल्ली तो मयस्सर होता

 ऐसी तन्हाई में किस तौर गुजारा कर लें

 

कोई रहबर है न है नक़्शे कफे पा कोई

 उसकी आँखों को ही चल राह का तारा कर लें

 

दश्ते दुनिया में कहीं जाएँ न साया पायें

आबला पा तेरे किस सिम्त सहारा कर लें

 

 मानते हैं कि तेरी राह जुदा है आगे

क्यों न माजी के सफ़र को ही दुबारा कर लें

2 Comments

I had some problem in understanding some parts….still trying to piece it together. Loved the closing lines.

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तुख्म – अंकुर असबाब-कारण,वजह नक्शे कफे पा- चरण चिन्ह दश्त-वन अबला पा -पैरों में फफोले पड़े हों जिसके माजी-भूतकाल पूर्व में बीता हुआ समय. आशा है अब मेरी रचना कुछ सपष्ट हुई होगी .दिल से पढ़िएगा तो ख़ामोशी भी कहती है बहुत वर्ना दुनिया में तो उजलत यूँ ही रहती है बहुत.

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