क्यों हो रही है हांजी हांजी…….
२६/११ जैसी घटनाओं के बाद भी जिनका खून ना खौला हो, वे कृपया इस
रचना को ना पढ़े……………
इस रचना को मैंने मराठी में लिखा था, परन्तु मराठी वाचक कम होने के कारन इसे हिंदी और मराठी दोनों भाषाओँ में प्रस्तुत कर रहा हूँ …..
क्यों हो रही है हांजी हांजी,
क्यों कर रहे हो खुशामद,
दिन भर गए है उनके,
रहना नहीं उन्हें सलामत,
क्यों दे रहे हो सबूत,
क्यों जोड़ते हो हाथ,
औकात नहीं इतनी उनकी,
मारो कमर पे लात,
कहते है ठोस सबूत नहीं,
बाप को बाप मानेंगे या,
माँ पर भी विश्वास नहीं……..
कशाला त्यांना कुरवाळता,
कशाला हि खुशामत ,
दिवस भरले आता त्यांचे,
रहायचे नाही सलामत,
नका देऊ पुरावे,
नका जोडू हात,
भाऊबंदकी सोडा आता,
घाला कमरेत लात,
शेकडो पुरावे देऊनही,
म्हणतात सबळ पुरावा नाही,
बापाला बाप म्हणतील कि,
मायेवरही विश्वास नाही…….
10 Comments
वाह, डॉ साहिब, भई वाह, आप सच में हैं बड़े उस्ताद,
अपने नेतागण इतने कायर, डरते कहने से जो बात,
आपने लिखकर बता दी, जो हर सच्चे हिन्दुस्तानी की है आस,
“अवकात नहीं इतनी उनकी, मारो कमर पे लात,
बाप को बाप मानेंगे या, माँ पर भी नहीं है विश्वास?”.
इस सच्ची तगड़ी रचना के लिए हार्दिक अभिवादन (salute)
मराठी मधली रचना पण तितकीच शक्तिशाली अन खूप सुदर आहे.
त्याना असलीच रचना आणि कृति धडा शिकवूं शकेल. आम्ही खूब सहन केल आहे,
dr.paliwal Reply:
November 30th, 2009 at 6:27 pm
@Vishvnand,
Bahut dhanyavaad sirji…..
Sirji meri aankhoke samne abhi bhi, vah bachcha aata hai jiske maa bap 26/11 ko mare gaye the, mujhe mera vo dost yaad aata hai jo CST pe mara gaya tha….
खोलते खून से लिखी ये रचना और भी शक्तिशाली हो जाती अगर कुछ टंकण त्रुटियों की और हम ध्यान देते सही शब्द हांजी हांजी होना चाहिए हाजी शब्द हज करके आनेवाले मुस्लिम भाइयों के लिए प्रयोग में आता है इसी प्रकार सही शब्द खुशामद ,औकात,सैकड़ों है.कृपया सम्पादित करके इस कविता को नयी शक्ति प्रदान करें.
सच कहा “लातों के भूत बातों से नहीं मानते
ये चापलूसी नहीं जूत की भाषा जानते
हांजी हांजी करके इनको क्यूँ सर चढ़ा रहे
बारह के भाव बिकने वाले ये ,दाम क्यूँ बढ़ा रहे
इनको गले में जूतों की माला चाहिए
इनको डुबोने के वास्ते गन्दा नाला चाहिए”
dr.paliwal Reply:
November 30th, 2009 at 6:31 pm
@chandrakant,
Bahut dhanyvaad sirji…..
maine galtiyan sudhar di, parantu ’sainkdo’ fir baki rah gaya….sorry..
aapki sundar tippani ke liye dhanyavaad…..
You have put across the thought that we all share in a subtle and effective way…..I liked the Marathi version more
Simply beautiful write up. Impacting directly.

मैं बहुत बड़े सपने देख कर, उन्हें पुरा करने में बहुत बड़ी कोशिश करके आए, अति अल्प परिणामों से भी
बहुत संतुष्ट होनेवाला, विदर्भ के एक छोटेसे गाँव "इटखेडा" से हूँ, जो नक्शल प्रभावित इलाकों में से एक है, जहाँ के लोगों ने आज़ादी के 50 साल बाद पहली बार "सड़क" देखि. 1973 में इसी गाँव में मेरा जन्म हुआ, माँ मुझे सबसे प्यारी है, पिताजी की शालीनता बहुत भाती है, भाईके गुस्से से डरता हूँ, भतीजों से बहुत प्यार करता हूँ, पत्नी का प्यार जीने की आस है. जलगांव मेरी कर्मभूमि है.
तत्कालीन राष्ट्रपति आदरणीय "डॉ. APJ अब्दुल कलामजी" से काफी प्रभावित हूँ, एक कवि का मन रखने वाले "अटलजी" अच्छे लगते है, "स्व. बाबा आमटे" और उनके बेटे "विकास और प्रकाश आमटे" का कार्य देखने के बाद, समाज कार्य का जूनून मुझपर संवार हो गया. जहाँ किसी प्रकार के वाहन नहीं जातें, ऐसी जगहों पर जाकर भी मैंने मरीजों का मुफ़्त में इलाज किया है. उसीकी वजह से लगता है मेरा धरती पर आना सफल हो गया.
कभी कभी जब मै बहुत दुखी या बहुत खुश होता हूँ, बन जाती है कोई शायरी, या कविता, या गीत.
जोश जगा रही है ये रचना ,,,
बाप को बाप मानेंगे या,
माँ पर भी विश्वास नहीं……..
बहुत खूब ,,,,,,,!
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dr.paliwal Reply:
November 30th, 2009 at 6:24 pm
@Ravi Rajbhar,
Bahut bahut dhanyavaad…..
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