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क्यों हो रही है हांजी हांजी…….

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Hindi Poetry

२६/११ जैसी घटनाओं के बाद भी जिनका खून ना खौला हो, वे  कृपया  इस
रचना  को ना  पढ़े……………

इस रचना को मैंने मराठी में लिखा था, परन्तु मराठी वाचक कम होने के कारन इसे हिंदी और मराठी दोनों भाषाओँ में प्रस्तुत कर रहा हूँ …..

  

क्यों हो रही है हांजी  हांजी,
क्यों कर रहे हो खुशामद,
दिन भर गए है उनके,
रहना नहीं उन्हें सलामत,

क्यों दे रहे हो सबूत,
क्यों जोड़ते हो हाथ,
औकात नहीं इतनी उनकी,
मारो कमर पे लात,

सैंकड़ो  सबूतों के बाद भी,
कहते है ठोस सबूत नहीं,
बाप को बाप मानेंगे या,
माँ पर भी विश्वास नहीं……..
***************************************
 
कशाला त्यांना कुरवाळता……..

कशाला त्यांना कुरवाळता,
कशाला हि खुशामत ,
दिवस भरले आता त्यांचे,
रहायचे नाही सलामत,
नका देऊ पुरावे,
नका जोडू हात,
भाऊबंदकी सोडा आता,
घाला कमरेत लात,
शेकडो पुरावे देऊनही,
म्हणतात सबळ पुरावा नाही,
बापाला बाप म्हणतील कि,
मायेवरही विश्वास नाही…….

10 Comments

  1. Ravi Rajbhar says:

    जोश जगा रही है ये रचना ,,,
    बाप को बाप मानेंगे या,
    माँ पर भी विश्वास नहीं……..
    बहुत खूब ,,,,,,,!

  2. Vishvnand says:

    वाह, डॉ साहिब, भई वाह, आप सच में हैं बड़े उस्ताद,
    अपने नेतागण इतने कायर, डरते कहने से जो बात,
    आपने लिखकर बता दी, जो हर सच्चे हिन्दुस्तानी की है आस,
    “अवकात नहीं इतनी उनकी, मारो कमर पे लात,
    बाप को बाप मानेंगे या, माँ पर भी नहीं है विश्वास?”.

    इस सच्ची तगड़ी रचना के लिए हार्दिक अभिवादन (salute)

    मराठी मधली रचना पण तितकीच शक्तिशाली अन खूप सुदर आहे.
    त्याना असलीच रचना आणि कृति धडा शिकवूं शकेल. आम्ही खूब सहन केल आहे,

    • dr.paliwal says:

      @Vishvnand,
      Bahut dhanyavaad sirji…..
      Sirji meri aankhoke samne abhi bhi, vah bachcha aata hai jiske maa bap 26/11 ko mare gaye the, mujhe mera vo dost yaad aata hai jo CST pe mara gaya tha….

  3. chandrakant says:

    खोलते खून से लिखी ये रचना और भी शक्तिशाली हो जाती अगर कुछ टंकण त्रुटियों की और हम ध्यान देते सही शब्द हांजी हांजी होना चाहिए हाजी शब्द हज करके आनेवाले मुस्लिम भाइयों के लिए प्रयोग में आता है इसी प्रकार सही शब्द खुशामद ,औकात,सैकड़ों है.कृपया सम्पादित करके इस कविता को नयी शक्ति प्रदान करें.
    सच कहा “लातों के भूत बातों से नहीं मानते
    ये चापलूसी नहीं जूत की भाषा जानते
    हांजी हांजी करके इनको क्यूँ सर चढ़ा रहे
    बारह के भाव बिकने वाले ये ,दाम क्यूँ बढ़ा रहे
    इनको गले में जूतों की माला चाहिए
    इनको डुबोने के वास्ते गन्दा नाला चाहिए”

  4. Preeti Datar says:

    You have put across the thought that we all share in a subtle and effective way…..I liked the Marathi version more 🙂

  5. Raj says:

    Simply beautiful write up. Impacting directly.

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