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क्या क्या किया .…? (२६ / ११ के बाद )

क्या क्या किया .…? (२६ / ११  के  बाद )

नेताओं और शासकों,
हम बस आज भी
“क्या क्या करेंगे ”
ही कहते जाते हैं ….
एक साल पहले
इस दर्दनाक शर्मनाक हादसे के उपरांत
क्या क्या करेंगे ,
जो कहा था,
उस बारे में आज तक
क्या क्या किया,
ये सीधी तरह बतलाते क्यूँ नही….?
ताकि हम समझें तो सही
कि …..

देश के वीरों ने
जो बलिदान दिया, प्राणाहुति दी,
उनकी कुछ भरपाई हुई या नहीं ….?
जिसके वो हकदार हैं

आतंकवादिओं को फांसी या सजा
हुई या नहीं ….?
जो अत्यंत जरूरी है

आतंक के खिलाफ
कोई ठोस कारवाई की गई या नहीं….?
जिसका हम ने प्रण किया है

हम कठोर और ठोस कारवाई करेंगे
ये कहते रहने का कोई मतलब नहीं
ये सब जो अब सफ़ेद झूट सा लग रहा है,
कभी सच में परिवर्तित होगा या नहीं ….?

—- xxx —-

6 Comments

हकीकत की परतें खोलती एक सटीक रचना – जो हो गया उसका इनकी नजर में कोई अहमियत नहीं-क्या होना चाहिए इसका गुण गान नेताओं की जुबान पर रहता है-कोई भी आश्वासन कभी निर्णय को छू पाते – रचना के लिए बधाई

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Vishvnand Reply:

@sushil sarna
आपकी प्रतिक्रया का शुक्रिया,
और एक साल बाद, हमें इन सवालों के कुछ तसल्ली देने वाले जवाबों की कविता रचने की आशा है और भगवान् से प्रार्थना भी …देखें क्या होता है

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“करकरे,काम्टे और सालकर की शहादत क्या यू ही जाएगी
हवलदार तुकाराम को जनता क्या भूल पायेगी
कसाब के केस का क्या कभी होगा फैसला
हाथ पे हाथ धरे रखने से ,बढ़ रहा है उनका हौसला
अब तक न मिल पाया है ,पीड़ितों को मुआवजा
देश पे कुर्बानी की क्या मिलती यही सजा
दुःख हो रहा है साल यू ही निकल गया
आतंकवाद मुम्बई को पूरा निगल गया ”
————–आपकी सटीक रचना सरकार की ढुलमुल नीति की और सही इशारा करती है.केवल बयानबाजी और कुछ भी नहीं.

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Vishvnand Reply:

@C K goswami
आपकी सुन्दर रचनी रूपी प्रतिक्रया का शुक्रिया,
और एक साल बाद, हमें इन सवालों के कुछ तसल्ली देने वाले जवाबों की कविता रचने की आशा है और भगवान् से प्रार्थना भी …देखें क्या होता है

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लेखागण और कविगण हम केवल लिखते रह सकते है यदा-कदा,
क्योंकि अब हम जैसे बूढ़े हैं और बीमारी से लड़ते रहते सदा !
हमको दिखना चाहिए कोई हनुमान जैसा लेके गदा,
ताकि आतंकवाद को हम सब मिलकर कर सकें विदा !
मैंने पहले भी ऐसी रचनाएं लिख मारी थीं,
शायद ही सरकारी तंत्र ने उन पर दृष्टि डाली थी !
वर्ष होगया पूरा मुंबई के आतंकी हमले का,
खुशहाली में है अब मुंबई नहीं फ़िक्र उस मामले का !
“आतंकी-संक्रमण”, “आतंकवाद” नामक मेरी थीं मेरी कवितायेँ,
क्या हम बार-बार लिख करके अपना व्यर्थ ही समय गंवाएं ?
इस दुविधा से व्यथित होके मैंने भी एक और कविता लिख डाली,
“गिद्ध दृष्टि” शीर्षक है उसका, क्या किसी ने दृष्टि डाली ?
आपकी भी प्रश्नवाचक कविता है ऐसी ही निराली,
५-सितारे अंकित होगये अब जगह नहीं है खली !
क्षमा करें मेरे सामने रखदी गई है भोजन की थाली !

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Vishvnand Reply:

@ashwini kumar goswami
आपके इस सुन्दर अर्थपूर्ण प्रतिक्रयारुपी जवाब का जवाब नहीं.
आपकी रचना “गिद्ध दृष्टि” भी बहुत उपयुक्त अर्थपूर्ण वैचारिक रचना है और उसपर क्या कमेन्ट करें इस विचार में खो सा गया हूँ,
बहुत शुक्रिया

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