Quick Links: English Poetry | Hindi Poetry | Poetry Podcasts | Editor's Pick | Forum
Email This Poem |

भर न मुट्ठी में जान कर जुगनू

आप  माना  बुलान्दो  बाला  हैं

साया  क्यों  बेपनाह  काला  है

भर  न  मुट्ठी  में  जान कर  जुगनू

यूँ  न  सूरज  ये  छुपने  वाला  है

अनगिनत  बस्तियां  अँधेरी  हैं  

तब  कहीं  महल  में  उजाला  है

पेड़  शाखें  कटा  ये  सहमा  सा

बस  तरक्की  का  एक  निवाला  है

वो  जो  करता  सवाल  था  अक्सर

उसको  लो  शहर  से  निकाला  है

मुल्क  जिनके  हवाले  रक्खा  है

उनको  भाने लगा  हवाला  है

2 Comments

क्या बात है, बहुत अच्छे,
पूरी नज्म बड़ी मनभाई …
हर शेर बड़ा दिलवाला है..

Comment on this comment

siddha Nath Singh Reply:

@Vishvnand, धन्यवाद , पाठक की प्रशंसा ही रचनाकार की संजीवनी होती है . आशा है आगे भी अनुगृहीत करते रहेंगे . प्रतिक्रियाएं बहुत कम ही मिलीं हैं मुझे किन्तु कर्मंयेव्धिकारस्ते सो मैं अनवरत अपनी रह पर चल रहा हूँ .शायद अपने आप को छल रहा हूँ -धन्यवाद एक बार फिर से सर .

Comment on this comment

Leave a comment

(required)

(required)

(Press Ctrl+G to toggle between English & Chosen Indian language)