तू है ज़मीन तेरी हदें हैं बंधीं हुईं
फिरकों में बाँट बाँट के मत मुल्क तोड़ दे
कायद अगर है सच में तो चल सबको जोड़ दे
लगवाए पेड़ सबसे मगर फल न सबको दे
चल जड़ से इस निजाम को कस कर झिंझोड़ दे
है ज़िन्दगी नदी तो समंदर में क्यों गिरे
कैलास की तरफ चले कुछ ऐसा मोड़ दे
इस भूख का न चंद निवालों से हल मिले
रख वो अमल निवाले खुदा सौ करोड़ दे
तू है ज़मीन तेरी हदें हैं बंधीं हुईं
तू आसमां नहीं कि हदें सारी तोड़ दे
सबको कुचल के आगे बढ़ें ऐसी होड़ क्या
सब साथ चल सकें तू लगा ऐसी होड़ दे

खूबसूरत ग़ज़ल.
भावपूर्ण और मनभावन …
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siddha nath singh Reply:
November 28th, 2009 at 10:18 am
@Vishvnand, thanks janab.-s.n.singh
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