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मुखबिरी अश्कों ने दर्दे दिल की की

हो गए रुखसत मकीं घर रह गए
शाख पर टूटे हुए पर रह गए
बदलियाँ बरसीं समंदर पर सभी
फिर हमारे खेत बंजर रह गए
यादे माजी दोस्तों को आ गयी
कांप कर हाथों में खंजर रह गए
फिर बहारों ने किया आगे कयाम
यां तो वीरानी के मंजर रह गए
फिर जुनूने इश्क ही काम आ सका
होश वाले खा के ठोकर रह गए
सब बराबर हैं किताबों ने कहा
बस किताबों में बराबर रह गए
मुखबिरी अश्कों ने दर्दे दिल की की
हम थे वर्ना होंठ सीकर रह गए
गम गुसारी का उठा जैसे रिवाज़
लब ब लब बातों के नश्तर रह गए
तजकिरा उनसे नहीं क्या क्या हुआ
दिल के ही अहवाल अक्सर रह गए
फिर खिजां ने भेजीं पीली पातियाँ
फिर बहारों के भरम भर रह गए
थीं नहीं ये मंजिलें अपनी कभी
जिनपे थक कर सरे रहबर रह गए

4 Comments

Vah…. bahut khoob….
har pankti behad sundar bhav samete hai…..

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siddhanathsingh Reply:

@dr.paliwal, shukriya tumko bhi kah kar rah gaye-S.N.Singh

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बहुत सुन्दर बहुत खूब
शेर हरइक खूबसूरत अपने ही अंदाज़ का
हम इन्हें मस्ती से पढ़ते रह गए.

इस रचना के लिए हार्दिक बधाई

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siddhanathsingh Reply:

@Vishvnand, aap se sudhi aur samvedansheel pathak ki prashansa mere utsah ko doguna karti hai. Dhanyavad-S.N.Singh

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