मुखबिरी अश्कों ने दर्दे दिल की की
हो गए रुखसत मकीं घर रह गए
शाख पर टूटे हुए पर रह गए
बदलियाँ बरसीं समंदर पर सभी
फिर हमारे खेत बंजर रह गए
यादे माजी दोस्तों को आ गयी
कांप कर हाथों में खंजर रह गए
फिर बहारों ने किया आगे कयाम
यां तो वीरानी के मंजर रह गए
फिर जुनूने इश्क ही काम आ सका
होश वाले खा के ठोकर रह गए
सब बराबर हैं किताबों ने कहा
बस किताबों में बराबर रह गए
मुखबिरी अश्कों ने दर्दे दिल की की
हम थे वर्ना होंठ सीकर रह गए
गम गुसारी का उठा जैसे रिवाज़
लब ब लब बातों के नश्तर रह गए
तजकिरा उनसे नहीं क्या क्या हुआ
दिल के ही अहवाल अक्सर रह गए
फिर खिजां ने भेजीं पीली पातियाँ
फिर बहारों के भरम भर रह गए
थीं नहीं ये मंजिलें अपनी कभी
जिनपे थक कर सरे रहबर रह गए
4 Comments
बहुत सुन्दर बहुत खूब
शेर हरइक खूबसूरत अपने ही अंदाज़ का
हम इन्हें मस्ती से पढ़ते रह गए.
इस रचना के लिए हार्दिक बधाई
siddhanathsingh Reply:
November 25th, 2009 at 10:10 am
@Vishvnand, aap se sudhi aur samvedansheel pathak ki prashansa mere utsah ko doguna karti hai. Dhanyavad-S.N.Singh

Vah…. bahut khoob….
har pankti behad sundar bhav samete hai…..
Comment on this comment
siddhanathsingh Reply:
November 25th, 2009 at 10:09 am
@dr.paliwal, shukriya tumko bhi kah kar rah gaye-S.N.Singh
Comment on this comment