इस शहर में….
इस शहर में क्यूँ मन रम रहा
जब अपना कोई भी ना रहा
सर्पीली सड़कों पर भागती
बेमानी सी गाड़ियाँ
चकाचौंध रातों में रोशन
तारों जैसी बत्तियां
मुस्काते चेहरों के पीछे
दीखता है इक दर्द छुपा
इंसानी जज्बा भी यहाँ
गर्मी से महरूम रहा
इस शहर में …..
ऊँचे ऊँचे महलों जैसी
खुलती आकाश पे खिड़कियाँ
हर किसी को नसीब नहीं होती
सूरज की गर्म रोशनियाँ
छाँव नहीं अब हरियाली की
और टूटी हैं पत्तियां
नर्मुदों की भीड़ में भी
रुकता नहीं जीवन यहाँ
इस शहर में …..
रंग बिरंगे परिधानों में
सजी आज की तितलियाँ
कहते थे जिसे तहजीब अपन
खो गयी हैं वो सरगोशियाँ
पल में मिलते पल में हो जुदा
कैसा है ये रूप खुदा
इंसानी रिश्तों ने बदले
देखो कितने रूप यहाँ
इस शहर में क्यूँ मन रम रहा
जब अपना कोई भी ना रहा
5 Comments
सुन्दर मनभावन रचना है, अर्थपूर्ण भी ,
पर इतने बड़े font और ऐसे presentation की जरूरत भी नहीं,
जो कविता के बदले अपने पर ज्यादा ध्यान आकर्षित करे …
स्तुत्य रचना …
“इस शहर में क्यूँ मन रम रहा
जब अपना कोई भी ना रहा ”
मन ना रम रहा सही,
पर पैसा तो मिल रहा यहाँ ….
pku31in Reply:
November 24th, 2009 at 12:35 pm
@Vishvnand, Vishvnandji…aapki sarahana aur salaah ke liye haardik aabhaar…aage se kavita chote fonts mein hogi….pic lagane se kavita ka arth aur praasangik ho jaata hai aisa mera maanana hai.
Vishvnand Reply:
November 24th, 2009 at 7:06 pm
Mera kahanaa picture se nahiin thaa. Vo to upyukt hii hai. Mera matlab sirf Font size aur words/lines ki unnecessary color shading say tha, jo theek padhane me baadhaa daltii hain. Is kavitaa me bhii aap edit kar badalaav laa sakate hain.
pku31in Reply:
November 24th, 2009 at 7:28 pm
@Vishvnand, aapke sujhaav anusaar badlaavkar diye gaye hain….thanx a bunch for suggestions.


Bahut sundar rachna……
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