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रिश्तों के धागे

रिश्तों की ये नाजुक डोर

न पड़े कभी कमजोर,

बुनते हैं अपनों के संग सपने

मनभावन ये प्यारे धागे।

सहेजो इन्हें हर पल

न पड़े इनमें कोई बल,

सच्चाई, प्रेम व विश्वास हो गर इनमें

निखर उठेंगे सुमधुर ये  धागे।

माना हर आत्मीय अपने से

न हो सकोगे हर वक्त तुम सहमत,

पर मतभेदों से भी चटख न पाएँ

भावनाओं से बँधे ये धागे।

8 Comments

beautiful
loved it

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एक सुन्दर रचना

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बहुत सुन्दर रचना, मनभावन.
पढ़कर लगा की जैसे ये TV पर कोई नए उचित और सुन्दर पारवारिक हिंदी सीरियल का शीर्षक गीत हो, एक ऐसा सीरियल जो इस कविता की भावनाओं को उजागर करे, ना की बाक़ी के फालतू पारवारिक सीरियल की तरह हो जो गलत संस्क्रती उजागर करते है.
रचना के लिए हार्दिक बधाई .

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सचमुच…
कास ऐसा ही होता हर रोस्तों का धागा…
बधाई…

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Nice poem on relations Sangeeta-badhaaee

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bahut achha likha hai aapne.

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Bahut sundar rachna…..

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