राही
गुंजन भँवरे की सुन सुन कर
पलकें खोली हैं कलियों ने
कजरारी निशा को धवलित कर
छिटकाई लाली सूरज ने
उन्मुक्त गगन में उड़ते पंछी
चल दिए नए नीड़ों की ओर
कल कल करती नदिया भी कहे
उठ जाग मुसाफिर ये है भोर
उठ जाग मुसाफिर ये है भोर
सफ़र तुझे है लम्बा जाना
राहों में तू थक ना जाना
नित नए दृश्य हैं जीवन के
कभी ना तू इनसे घबराना
काँटों की डगर पर चलते चलते
जीत मिलेगी हँसते हँसते
राही बस तू चलते ही जाना
अन्जाना सफ़र है बड़ा सुहाना
अन्जाना सफ़र है बड़ा सुहाना
5 Comments
Bhor ke samay ka atyanta hi sundar varnana. Is suhani rachana ke liye badhaai!
pku31in Reply:
November 23rd, 2009 at 5:11 pm
@Sangeeta Mundhra, thank u sangeetaji for ur appreciation.


बहुत खूब और बड़ी मनभावन रचना
साथ हो कविता ऐसी सुन्दर,
बन जाए सब समा नगीना,
फिर जीवन में कहें सभी जन,
अन्जाना ये सफ़र सुहाना .
Comment on this comment