उजड़ गए नींदों के मधुबन मुरझाये ख्वाबों के फूल
तर्राई नज़रों से डर कर मूल्य हुए सारे विद्रूप
जिह्वाएं दोमुहीं हो चलीं रक्षक तक्षक के प्रतिरूप
उजड़ गए नींदों के मधुबन मुरझाये ख्वाबों के फूल
डूब गए जांसोज़ सफीने तैर रहे मुर्दा मस्तूल .
विस्फोटों से नाप रहे सब कितना बहरा है कानून
लाँघ हदों को आंके बैरी पानी है रग में या खून.
तलवारें बस बोल रही हैं सभ्य सभासद चुप निस्तब्ध
रोटी लुप्त मगर फांसी के लिए रस्सियाँ नित उपलब्ध
रुमालों में इत्र समोए और लहू से कुरते लाल
चमक रहे सारे मंचों पर चेहरे छद्म गुलाबी गाल
चौराहों पर खैरातें हैं गलियों में मकतल गुलज़ार
पहुंचा कहाँ कहाँ से चल कर देख कयादत का मेयार
खुद से भी कुछ कह न सके तू इतना तो खुद्दार न बन
आवाजों के इस जंगल का गूंगा पहरेदार न बन
बुनी चदरिया कितनी झीनी नग्न प्राय शरमाय कबीर
निगमागम नाना पुराण पढ़ बुद्धि विहत तुलसी सरि तीर
10 Comments
“खुद से भी कुछ कह न सके तू इतना भी खुद्दार न बन
आवाजों के इस जंगल का गूंगा पहरेदार न बन”
बहुत ही सुन्दर लेखन.
siddha nath singh Reply:
November 23rd, 2009 at 4:02 pm
@c k goswami, धन्यवाद
आशा है मेरी अन्य रचनाओं पर भी निगाह डालेंगे.
Lajawab rachna hai…..

बहुत सुन्दर रचना है और अपने इस बारे में आज के हालात पर और अपने कायर रुख पर गहन और प्रभावी प्रहार है l . इस बारे में हम क्या कर रहें है? यूं हीं फिजूल की बातों में समय गंवाते हुए चुपचाप कायर से इधर उधर भटक रहे हैं. कोई ठोस और ठीक policy अपना नहीं रहे…
“विस्फोटों से नाप रहे सब कितना बहरा है कानून
लाँघ हदों को आंके बैरी पानी है रग में या खून.”
“बुनी चदरिया कितनी झीनी नग्न प्राय शरमाय कबीर
निगमागम नाना पुराण पढ़ बुद्धि विहत तुलसी सरि तीर” बहुत खूब कहा है
उधर स्वर्ग में भी अपने महात्मा गांधीजी बहुत मायूस हो तड़पते होंगे की हमने इन्हें स्वतन्त्रता के लिए अहिंसा का पाठ पढ़ाकर बड़ी गलती की है जो इन्हें स्वतन्त्रता के बाद सिर्फ कायर और लोभी ही बनाने में ही कामयाब हुई है …
इस अति सुन्दर उपयुक्त रचना के लिए हार्दिक बधाई और धन्यवाद भी …
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siddha nath singh Reply:
November 23rd, 2009 at 4:01 pm
@Vishvnand, धन्यवाद स्वर्गीय श्री रविन्द्र नाथ त्यागी की पंक्तियाँ हैं कि-
गाँधी जी वहीँ के वहीँ रह गए अफ़सोस उनके बन्दर बहुत आगे निकल गए .
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Vishvnand Reply:
November 23rd, 2009 at 8:02 pm
@siddha nath singh
आपके कमेन्ट ने मुझे मेरी एक गांधीजी के बंदरों पर लिखी इंग्लिश कविता याद आ गयी जो मैं कल पोस्ट करूंगा. जरूर अवलोकन करें .
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siddhanathsingh Reply:
November 24th, 2009 at 10:23 am
@Vishvnand, main adhir aur utsuk hun-S.N.Singh
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