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अपना किस्सा ….! (1970)

This poem was composed  in  the year 1970, for an office party of executives, as an attempt to describe अपना किस्सा of  busy young company executives with respect to their wives,  educated,  accomplished, but  mis-employed & working at home as  housewives.  This was then the case with most young married executives.

 

अपना किस्सा ….! (1970)

जब  चेहरे  पर  मुसकान  लिए,
तुम  प्यार  से  बातें  करती  हो,
दिल  कहता  है  ये  सपना  है….

जब  रूठी  रूठी  तू  रहती,
कोई  बात  तुझे  ना  भाती  है,
ये  असली  किस्सा  अपना  है……

तुम  ऐसे  हो,  तुम वैसे  हो,
कुछ  घर  का  ख्याल  नहीं  करते,
ना  बातें  भी  करते  सच्ची,
सच
सुनने से  भी  डरते  हो,
मेरी माँ मुझसे कहती है,
व्यवहार
में भी तुम कच्चे हो ……
जो  सुनना  पड़ता  रोज  रोज,
ये  असली  किस्सा  अपना  है…..

मर्दों  का  क्या,   तुम  बड़े  लकी,
हररोज  जो  ऑफिस  जाते  हो,
आराम  से  रहते  दिनभर  तुम,
और  देर  से  घर को  आते  हो,
घर  के  हैं  कितने  काम  कठिन,
सब  हमें  अकेले  पड़ते  हैं….
आवाज  बर्तनों  की  सुनकर,
में  तुम्हे  बिजी  सा  पाता  हूँ,
ये  असली  किस्सा  अपना  है ………

पर, कभी कभी ……

थका बेचारा हारा मैं
जब देर से घर वापिस आता…
फिर भी …चेहरे पर तेरे हँसी पाता…!!
(विश्वास नहीं होता ना …, तो आगे सुनिए ..)

पर, कभी कभी,
थका बेचारा हारा मैं
जब देर से घर वापिस आता,
चेहरे पर तेरे हँसी पाता .…!!
हर काम छोड़, जल्दी में तुम
दौड़ी आती हो पास मेरे ….
तब लगता है ये सपना है …!!.

जब  चेहरे  पर  मुसकान  लिए,
तुम  प्यार  से  बातें  करती  हो,
दिल  कहता  है  ये  सपना  है….

जब  रूठी  रूठी  तू  रहती,
कोई  बात  तुझे  ना  भाती  है,
ये  असली  किस्सा  अपना  है……

—- ” विश्व नन्द ” —

4 Comments

Ek majedar, nokzonk bhari sundar rachna sirji….

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Vishvnand Reply:

@dr.paliwal
सुन्दर कमेन्ट के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद

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“गुस्से में तू देखे फिर भी , गुस्से में प्यार टपकता है
नैनो में भरी शरारत का इक जुगनू कोई चमकता है
तेरा गुस्सा भी लगता प्यारा ,जब झूठी रूठा तू करती
मैं जितना तंग करूँ तुझको ,तू प्यार मुझे उतना करती ”

नोक-झोंक की एक सुन्दर रचना.

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Vishvnand Reply:

@c k goswami
आपकी सुन्दर प्रतिक्रया के लिए सहर्ष आभार..

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