तेरे साथ ही हू….
बावरी सी घूमा करती है,
तू जो दर-ब-दर………
मेरे शिकवे,
खुली खिड़कियों से करते हुए…
खुश हो लेता हूँ, पल दो पल….
जो मिल जाती है, कभी कभी,
किसी झोंके के साथ बहती हुई……
कभी सर्द ठंडी हवाओं मे,
कांपती, ठिठुरती……
ऐसा नही की मैं समझता नही,
एहसास है उस आवारगी का,
और दर्द जो उस ठिठुरन में है………..
पर मेरा लोभ,
मुझे रोक देता है…..
तुम्हे तुम्हारे घर के,
दरवाज़े तक ले कर गया,
कितनी ही बार……
कुछ सोचा फिर तुम्हे,
और खुद को भी,
गुमराह कर दिया……..
सोच बैठा, स्वार्थ की बात,….
तुम्हे घर दिखा दिया…
तो यूँ मिला ना करोगे…..
कभी कभी संयोग बन कर…..
मानता हूँ, की ये आवारगी,
तक़लीफ़ देती है,
पर मेरी दी हुई उस क़ैद से,
लाख बेहतर……
मैं तुम्हे सीमाओं में बाँध कर,
तुम्हारे अस्तित्व और महत्ता पर,
प्रश्नचिन्ह नही लगाना चाहता…..
तुम्ही कहो…..
कैसे मैं तुम्हारी सीमाएँ तय करूँ…..
कैसे तुम पर कोई नज़्म लिख दूं…..
गर किसी सांझ,
ढलते सूरज संग,
बुझते बुझते ये बात समझ जाओ,
तो भी मुझे अहसास मत होने देना……..
रख दिया करना कुछ शिकवे,
बुझी हुई खिड़कियों पर…
सुबह उठ कर मुझे,
खिड़की के पार देखना अच्छा लगता है…..
तुम्हारा शिकवा मुझे फिर से,
उलझा देगा, तुम्हारे ख़याल मे….
फिर तेज़ धूप से सना,
एक सारा दिन……
मुझे एहसास दिलाएगा…..
मैं कोलतार की पिघली सी,
सड़क पे नंगे पैर चलता,
खुद को सज़ाएं देता….
खिड़की पर के उस शिकवे को,
तसल्ली देता रहूँगा…..
गम ना कर, तू तन्हा नही,
आवारा हूँ…..
तेरे साथ ही हू….
मैं भी बेघर हू………
8 Comments
फिर तेज़ धूप से सना,
एक सारा दिन……
मुझे एहसास दिलाएगा…..
मैं कोलतार की पिघली सी,
सड़क पे नंगे पैर चलता,
खुद को सज़ाएं देता….
गजब की पंक्तियाँ – दिल को भा गयी
मन को छूती हुई भावों की शबनम में भीगी सुंदर और प्रभावशाली रचना-ऐसी रचना के लिए हार्दिक बधाई
बहुत प्यारा है ..
One of my favourite songs include “banwara man dekhne chala ek sapna”…I could smell a similar fragnence

दिवास्वप्नों से मेरा अटूट रिश्ता है, जीवन अपनी पूरी लय में है और मुझे सम्पूर्णता की दिशा में अग्रसर कर रहा है.........
संतुष्ट हूं की इस कुरुक्षेत्र में अकेला नही हूं..............ईश्वर की कृपा है मुझ पर.......
कविता से मेरा नाता लगभग १० वर्ष पुराना है, मेरा प्रयास यही है कि कविता को भाव के निकट रख सकूं, अर्थ और पुरूस्कार से दूर।
“गर किसी सांझ,
ढलते सूरज संग,
बुझते बुझते ये बात समझ जाओ,
तो भी मुझे अहसास मत होने देना……..”
sheer beauty …. prem ki gehentam gehrai samete hue…. …
they rightly say, “ignorance is bliss… nd love often makes us realize this truth… prem shaayad gumaano se pyaar kar denaa sikhaa detaa hai… this just struck me suddenly while reading ur poem….i wonder “y does one do so… kyaaa haqeeqat ki zameen itni kathor hai ki prem aksar gumaanon ki panahon mein hi adhik mehfoos mehsoos kiyaa kartaa hai… ??”
rachnaa behad behad khoobsoorat hai…. ek sire se doosre sire ko jis prakaar jodaa hai aapne aur rachnaa mein ek-atmaa banaye rakhi hai , veh kaabil-e-tareef hai….
“रख दिया करना कुछ शिकवे,
बुझी हुई खिड़कियों पर…
सुबह उठ कर मुझे,
खिड़की के पार देखना अच्छा लगता है….”
5 stars for u…
Comment on this comment
G a u r a v Reply:
November 16th, 2009 at 1:16 am
@vartika, शुक्रिया………..वर्तिका.
जहाँ जहाँ कोई कमी महसूस हो रही थी, वो तुम्हारे explanation ने पूरी कर दी………………………
Comment on this comment