mat chheeno mujhse mere swar/मत छीनो मुझसे मेरे स्वर
मत छीनो मुझसे मेरे स्वर I
जब कुंठाओं की बस्ती में दुविधा की आंधी चलती है
भूडोल सरीखी तब मेरी अनुभूति विविग्न मचलती है
शीशों की दीवारों के जब चिट्खन के स्वर मंडराते हैं
राहों में किरिचों के कोने खूंखार बने बिछ जाते हैं
तब साथ रुधिर के जख्मों से बहते मेरे अक्षर अक्षर I
कितना भंगुर मेरा साहस क्षणजीवी कितना है संबल
पाथेय अल्प पथ दीर्घ अधिक माथे पर जेठ रहा है जल
इस ज्वलित मरुस्थल में मुझको कुछ वासंती स्थल मिलते हैं
कुछ किंशुक अपनी ओढ़नियाँ मदहोश उड़ाते हिलते हैं
पल भर को और उमड़ पड़ती तब मस्ती की मासूम लहर I
मेरी संध्या के मंदिर में है धूल धुआं, न अगरु चन्दन
सीत्कार कर रहे अधरों पर चीत्कारों के अमुखर वंदन
तारों के देश अकाल पड़ा मेरे नभ में तम और सघन
आरती अँधेरे में खोई, है और असंभव अभिनन्दन
इन गीतों से ही बांध रखा अन्यथा मनोबल निज जर्जर I

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