म’ की महिमा
‘म’ की महिमा
‘म’ की महिमा है बड़ी, इसके देखो रंग
खेल ‘मराठी’ कार्ड को ‘मनसे ‘छेड़े जंग
‘मनसे’ छेड़े जंग ‘मुम्बई’में छाये’ मराठी’
‘महाराष्ट्र’ में बोलो हिन्दी खावो लाठी
‘म’ की’ ममता” ‘ मार्क्सवाद ‘ को धूल चटाये
‘मल्ल मुलायम’ ‘माया’ से कैसे बच पाए
‘मनु शर्मा’ पेरोल में पब में मस्ती उडाये
‘मधु कोडा’ मजदूर का बेटा ‘ अरबों खाए
प्रीती जैन के चक्कर में’ ‘मधु भंडारकर’ आये
‘मार्गशीर्ष’ का महिना ‘म’ की महिमा गाये
————–सी के गोस्वामी(चंद्रकांत) जयपुर
18 Comments
its very difficult 4 me to judge,
i am not as gr8 as u r,
wow what a piece
stars infinite
c k goswami Reply:
November 13th, 2009 at 8:56 am
@rajdeep, राज दीपजी , आप इतना ज्यादा सम्मान न दीजिये ,कहीं ऐसा न हो जाये की मैं आप लोगों के माप दंड में खरा उतरने से चूक जावूँ,
आपकी सराहना और प्रोत्साहन मुझमे शक्ति भरता है सामाजिक और राष्ट्रिय मुद्दों को उठाने और उन विषयों पर लिखने के लिए.आपकी हर टिपण्णी के लिए धन्यवाद्.
sachmuch बहुत ही सुंदर कटाक्ष किया है सर, पर इसे कोई राजठाकरे जी को पढाये तब न ….!
वैसे क्या कहना है आपका इस मनसे के “हिंदी विरोधी अभियान “..?
कृपया इसे अन्यथा न लेवे …..!
chandra kant Reply:
November 12th, 2009 at 4:01 pm
@Ravi Rajbhar, मनसे और राज ठाकरे हिन्दिविरोधी नहीं हैं.जो कुछ हुवा वो सब अति उत्साह के कारण हुवा है .यह राज ठाकरे भी जानते हैं की मराठी की अपनी कोई लिपि नहीं है .मराठी का अस्तित्व ही देव नगरी लिपि से है .हिंदी को राजनीती की गोटी बनानेवाले नेता दूसरी क्षेत्रीय भाषा को भी सम्मान दे तो शायद ऐसी नौबत नहीं आयेगी.राजनैतिक द्वेषता को भुनाने के लिए राजनेता भाषाओँ की बली न चढाये तो ही अच्छा है.
वैसे अपना ये मुद्दा भी नहीं है.काव्य रचना आपको पसंद आयी ,इसके लिए धन्यवाद्.
Ravi Rajbhar Reply:
November 16th, 2009 at 3:28 pm
@chandra kant,
माफ़ कीजियेगा सर….मैं आपके सामने एक बच्चा हूँ,,,पर इतना भी नहीं की अपनी बात न कह सके ….यह हमारा मुद्दा क्यों नहीं है….? भारत हमारा घर है और अपने घर में सबको बराबर अधिकार होना चाहिए…taji घटना ले लीजिये “सचिन जी के यह कहने पर मैं पहले भारतीय हूँ मराठी बाद में” पर भी मनसे ने बवाल मचाया…यहाँ तो हिंदी नहीं “भारत” को लिया गया..!
c k goswami Reply:
November 17th, 2009 at 10:53 am
@Ravi Rajbhar, रविजी,आप ही की तरह मेरी भी राष्ट्रवादी विचारधारा है आप ही की तरह हर भारतीय सोचता है.सब लोग मनसे और शिवसेना की संकीर्णता की भर्त्सना करते हैं.सचिन के विचार महान है हमें उसके विशाल ह्रदय और देशभक्ति पूर्ण बयान को सुनकर ख़ुशी होती है.मैं भी आप ही की तरह अपने आपको व्यथित अनुभव करता हूँ जब कोई संकीर्ण विचारों की पैरवी करता है.मैंने ये कभी नहीं कहा कि मनसे ने जिस प्रकार का हिंदी विरोधी व्यवहार किया,वो प्रशंसनीय था.
मेरा कहने का आशय केवल यह था कि राजनीती हम कवियों का मंच नहीं है और राजनेताओं को किसी भी भाषा को अपना हथियार नहीं बनाना चाहिए अब चाहे वो अबू आज़मी हो या मनसे.
आपकी भावनाओं और राष्ट्रवादी विचारधारा के लिए आपको बधाई
वाह, बहुत खूब, बहुत अच्छे
म की इस महिमा में आपकी,
मतलब बहुत मगज का है,
मसलों का इन हल ढूढ़ना ,
महत्व का अब बहुत हुआ है,
म से ही कोई मंत्र मिले हमको ए यारों
मन को मिलाने मन ही मन चलो सोचें प्यारों
chandra kant Reply:
November 12th, 2009 at 3:29 pm
@Vishvnand, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे)
ने अति उत्साह में ये कदम उठाया था उसका उन्हें भी अफ़सोस होगा किन्तु इसी अति उत्साह ने एक बार तो अपनी जन्मदात्री माता का अपमान कर दिया..माँ के पेट से ही औलाद का जन्म होता है और उसी माँ (देवनागरी लिपि) से ही मराठी भाषा को पहचान मिली है.मराठी की अपनी लिपि कौन सी है?
कोई भी राजनैतिक दल अपने राज्य और भाषा तथा संस्कृति की रक्षा करता है उसका प्रचार करता है ,तो कोई गलत नहीं है किन्तु अगर संविधान में निर्धारित भाषा के प्रयोग को रोकने कि चेष्ठा करता है तो वो गलत है.मुम्बई को आर्थिक राजधानी बनाने में जितना योगदान गुजराती,मारवाडी,सिन्धी और पञ्जाबी का है
उतना ही उसकी tarakki करने में dakshin bhartiyon तथा bangali ,पारसी karamchariyon का रहा है. uttarpradesh,bihaar और madhyapradesh के shramikon ने मराठी भाईयो के साथ कंधे से कन्धा मिला कर मुम्बई को ये शक्ल दी है. मराठी लोगों ने बाहरी लोगों को न केवल सुरक्षा दी है बल्कि उनकी संस्कृति रीति रिवाजों को महाराष्ट्र में भी जिन्दा rakha है.
मराठी कोई मसला नहीं है ,जिसे हल किया जाना है .यह तो एक राज्य ,उसकी भाषा और उसकी संस्कृति को आदर तथा सम्मान दिए जाने की बात है,जो उसे मिलना चाहिए. धन्यवाद्
Vishvnand Reply:
November 12th, 2009 at 3:52 pm
@chandra kant ji,
आप ज़रा सोचिये, इतने सालों से किसीने किसीको ऐसा रोका था?. फिर अब ही और किसी एक व्यक्ति पर चुने हुए संसद सदस्यों को गुस्सा क्यूँ आया और अपमान सा क्यूँ लगा और वो ऐसा करने पर क्यूँ प्रवृत हुए. राष्ट्रभाषा के अपमान का जनक कौन था. वो व्यक्ति भी उतना ही या शायद उनसे ज्यादा दोषी है.
देखन को छोटी लगे पर घाव करे गम्भीर
जाने अपने तरकश में आपने कितने छुपाये हैं तीर
ऐसी रचना के लिए करें बधाई स्वीकार
पढना चाहें ऐसी रचना ये दिल बारमबार
बहुत सुंदर, सटीक और निष्पक्ष, – हार्दिक बधाई
c k goswami Reply:
November 14th, 2009 at 10:33 am
@sushil sarna, आप लोगों की सार्थक टिपण्णी पा कर दिल खुश हो जाता ह धन्यवाद्
एक और अलंकारयुक्त काव्यात्मक रचना.
chandra kant Reply:
November 16th, 2009 at 11:49 am
@Panch Ratan Harsh, DHANYAWAD HI KAH SAKTA HUN AAPKI TIPPANI PAR.
निशब्द और अचूक
Raj Reply:
November 16th, 2009 at 8:56 am
Early hit on submit in above comment. What I meant to say was – मैं रह गया निशब्द, आपकी रचना है अचूक.

retired bank manager from central bank of india .
wrote few title songs for tv serials.
belongs to bikaner (rajasthan)
present address-51/56 saryu marg mansarovar jaipur 302020
mobile 09785211353
बहुत सटीक और कटाक्षपूर्ण कविता के लिए बहुत बहुत बधाई ! आपकी लेखन
शैली अति गुह्यतम और सत्य का पौधा हो जैसी लगाती है जिसकी सिचाई करने
हेतु पांच सितारे सहर्ष आगये हैं !
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chandra kant Reply:
November 12th, 2009 at 3:33 pm
@ashwini kumar goswami, aapki tippani ke liye hriday se dhanyawad.
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