Quick Links: English Poetry | Hindi Poetry | Poetry Podcasts | Editor's Pick | Forum
Email This Poem |

प्रिया मेरी इक खोज हो तुम

priya meri

 

 

 

 

 

 

 

प्रिया  मेरी  इक  खोज  हो  तुम
कुछ  जानी  कुछ  अनजानी  सी

ख्वाबों  में  धुन्धलाया  चेहरा
कुछ  जाहिर  कुछ  खोया  खोया
छूना  चाहूँ छू न  पाऊँ
छवि  जैसे  हो  पारे  की

प्रिया  मेरी  इक  खोज  हो  तुम
कुछ  जानी  कुछ  अनजानी  सी

ढूंढा  तुझको  अंतर्मन  में
नरमुंडों  के  वीरानों  में
दिखेगी  तू  उस  भीड़  में  भी
सबसे  अलग  अकेली  सी

प्रिया  मेरी  इक  खोज  हो  तुम
कुछ  जानी  कुछ  अनजानी  सी

बोझिल  अँखियाँ  आशा  मन  में
बैठा  हूँ  इंतज़ार  में  अब  मैं
वह  मोड़  जहाँ  पर  मिलेगी  तू
मुझको  बाहें  फैलाये  सी

प्रिया  मेरी  इक  खोज  हो  तुम
कुछ  जानी  कुछ  अनजानी  सी

No Comments

Leave a comment

(required)

(required)

(Press Ctrl+G to toggle between English & Chosen Indian language)