कुदरत के मारे – ये हींजडे बेचारे
कुदरत के मारे – ये हींजडे बेचारे
पोते के जन्म पर हिन्जड़ो ने शर्माजी के घर डाला डेरा
दो हिन्जडा पार्टियों ने बधाईऔर नेग लेने वास्ते उन्हें घेरा
शर्माजी बोले”असली हिन्जड़ा पार्टी ही नेग पायेगी
दोनों में जो भी अपने खानदान का नाम बताएगी ”
शर्माजी ने कुदरत के मारो पर हँस के पासा फेंका
सुनकर दोनों हिन्जडा पार्टी ने दर्द से इक दूसरे को देखा
एक हिन्जडे से चुपः ना रहा गया
ये बेहूदा मजाक सहा नहीं गया
बोला
हम जिस हालत में हैं, वो पाप तुम्हारे ही किसी भाई भाभी ने किया
अपना तो मनोरंजन करते रहे पर हमें ये रूप दिया
वो खानदान का नाम देने से घबरा रहे है
पर हमारे खानदान तो ऐसे ही चले आ रहे हैं
नाजायज़ माँ-बाप की हम जायज़ संतान हैं
हमारा भी बाप कोई आप ही सा इंसान है
जनम देकर उनने हमें भुला दिया
हमपे सब हँसे,पर सब ने हमें रुला दिया
हमारी दशा देखकर हमको अपनों ने छोडा है
खानदान से हमने नहीं,उन्होंने रिश्ता तोडा है
आप ही के किसी भाई की हम संतान हैं
आप समझ जाइए हमारा कौन सा खानदान है
शर्माजी को प्रकृति के मारों से मजाक महँगी पड़ी
हिन्जडो से ज़वाब सुन उन्हें शर्म आई बड़ी
————–सी के गोस्वामी (चन्द्र कान्त )जयपुर
12 Comments
सर आप जहाँ हाथ डालते हैं वहा से मोती निकलते हैं
एक uljhe हुवे विषय पर खुबसूरत कविता…..!
c k goswami Reply:
November 12th, 2009 at 9:28 am
@Ravi Rajbhar, इन अनदेखे विषयों पर कोई तो लिखने आगे आये,यही सोचकर अन्छुवे पहलूवों पर लिखने की कोशिश करता हूँ .प्रेम प्यार विरह सुलह की काल्पनिक कवितावों की बजाय मेरा जोर ऐसे सामाजिक विषयों पर रहता है जिन्हें हम सब को उठाने की जरुरत है.आपकी टिपण्णी के लिए धन्यवाद्.
शर्मा जी ने शर्म के मारे निकाला अपना पर्स,
जिसमें भरे नोट देखके हिन्जडों में हो गया हर्ष !
५१००/- की मांग करके वो लगे नाचने-गाने,
शर्माजी उठ भाग खड़े हुए, बीबी को बाहर भेजा,
हिन्जडों को कोई शर्म न होती न ही होता भेजा !
जोरशोर से लगे नाचने अटल थी हठधर्मी,
शर्माजी फिर बाहर आये मचायी गरमा-गर्मी !
रुपये ५०१/- निकालके रख दिए उनके सामने,
बंद किया दरवाजा और फिर लग गए घर के काम में !
नोट उठाकर देखे उनने पाए सारे असली थे,
चंपत हुए फटाफट सारे ही हिन्जरे नकली थे !
चंद्रकांत जी, आपकी उच्च श्रेणी की कविता पढ़कर मुझे कुछ आगे बढ़ाने की
इच्छा प्रकट हुई जो पूरी करदी, शायद आपको भी पसंद आये !
c k goswami Reply:
November 12th, 2009 at 9:37 am
@ashwini kumar goswami, अश्विनीजी,निस्संदेह यदि ये कविता व्यंगात्मक लिखने का मन होता तो मैं आपकी इन पंक्तियों से मार्गदर्शन लेता किन्तु कविता लिखने का उद्देश्य हींजडॉ के मानवीय पहलू को उजागर करना है .प्रकृति के कोप के शिकार इन लोगों को,जो हर किसी के उपहास का पात्र बनते हैं ,उनके प्रति संवेदना प्रर्दशित करने का मेरा प्रयास था.
यह भी सच है कि आजकल नकली हिन्जडे रेलवे स्टेशन बस स्टैंड आदि सार्वजनिक जगहों पर देखने को मिल जाते हैं और वो बिलकुल वैसे ही नकली होते हैं जैसे अश्विनीजी आपने अपनी काव्यात्मक टिपण्णी में दर्शाया है.
चंद्रकांत जी,
क्या बात है, बहुत खूब
बहुत अलग ढंग की, और उससे भी ज्यादा अलग विषय की,
प्रशंसनीय प्रसंगात्मक कविता .
उसपर अश्विनी कुमार जी का जोड़ भी बहुत मजेदार है .
रचना के लिए हार्दिक बधाई .
c k goswami Reply:
November 12th, 2009 at 10:52 am
@Vishvnand, aapki sakshep tippani par aabhaar vyakt karta hun.
चलो कोई तो समाज के इस तिरस्कृत और उपहास का पात्र बने वर्ग की मनोभावना उजागर करने आगे आया.इस प्रकार के अन्छुवे विषयों पर लिखना चंद्रकान्त्जी की विशेषता रही है.
c k goswami Reply:
November 16th, 2009 at 12:12 pm
@Panch Ratan Harsh, aapki bhavna mukhar huyee,shukriya.
बहुत सुन्दर तरीके से एक मरे हुए समझे गए दर्द के अस्तित्व का एहसास कराया है आपने. स-आदर नमन.
c k goswami Reply:
November 16th, 2009 at 12:12 pm
@Raj, uphaas ke patr aur samaj ke andekhe evam tiraskrit varg ki dil se nikli aah ko prastut karne ki cheshtha thi meri,aapne bhi is marm ko samjha ,dhanyawad.

retired bank manager from central bank of india .
wrote few title songs for tv serials.
belongs to bikaner (rajasthan)
present address-51/56 saryu marg mansarovar jaipur 302020
mobile 09785211353
Sir
app jaisa ban pana sayad musqil ho
kinti acchi kavita
aap kisi bhi samsamyik ghatna pe kavita gad sakne me saksham hai
,marvelous
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c k goswami Reply:
November 12th, 2009 at 9:22 am
@rajdeep, राज्दीप्जी आप जैसे लोगों के प्रोत्साहन देने से ही मैं समाज के अलग थलग पड़े लोगों के बारे में लिखने के लिए प्रेरित होता हूँ.आप अपनी राय और सुझाव देते रहिये.धन्यवाद्.
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