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“जरा* जटिल जीवन”

“जरा* जटिल जीवन”
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सहोदर भाई-बहनों की ओर ज़रा झांको !
उनकी भिन्न-भिन्न जीवन की शैली को आंको !
कोई चपरासी बनकर कष्टमय जीवन काट रहा,
दूसरा भाग्यवश उच्च-जीवन की मलाई चाट रहा !
तीसरा कलाकार है स्वभावतः कलहकार,
चौथा है आवारा छोड़ गया है घर-बार !

अलग अलग रहते हैं किसी को नहीं किसी से प्यार,
पुराने घर में बूढे माँ-बाप का अब सूना दरबार !
उनकी चिंता नहीं किसी को पड़े हैं वो बेबस लाचार,
भाग्य-भिन्नता ऐसी होती है ऐसा ही प्रकृति का सार !
सदा सोचते रहते काश, उनके भी बेटी होती,
चाहे चली जाती वो, जब उसकी शादी होती !

यदा-कदा वो आती-जाती, कुछ तो संतुष्टि होती,
बेटे मात्र समझते हैं संपत्ति अपनी बपौती !
आस-पड़ोस के लोग भी, नहीं डालते एक नजर,
किसी ने भी नहीं पूछा, क्यों पड़े बसाए सूना घर ?
मौत दिखाई पड़ती रहती, जब हों जाते अधिक बीमार,
क्या होगी तब दशा हमारे मृत शारीर की बिन परिवार ?

सांत्वना मन देता रहता, ये है सब ईश्वर की लीला,
पूर्व-जन्म के कर्मों का फल देने में है वो हठीला !
इस जीवन के कष्टों का हल होगा अगले जीवन में,
अब अंत निकट में है, ये समझलो अपने मन में !
लगता है दुनिया में अधिकतर माँ-बापों के हैं ये हाल,
बहुतेरे ऐसे ही बेटे, निज-जीवन में ही हैं खुशहाल !

पैतृक धन-संपत्ति लेने में है इकतरफा अधिकार,
माँ-बापों के प्रति हों रहा है यत्र-तत्र ही अत्याचार !
अब तक नहीं कानून में भी ऐसी कुंठा का उपचार,
ऐसी समस्त संतानों को है बार-बार धिक्कार !
पुत्र-जन्म होता है तब क्यों बजती है थाली ?
पुत्री को क्यों नहीं समझते इतनी भाग्यशाली ?

वास्तविकता में पुत्री रखती दो-दो घर की खुशहाली,
पुत्री-पुत्र की असमानता कभी न मिटने वाली !
हे कृपालु ईश्वर, तू ही कर सकता इसका निदान,
विश्वेश्वरी की कृपा है तुझपर, दे दे पुत्रियों को वरदान !
हे भगवान, हे भगवान,
हे करुणासागर दयानिधान  !

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जरा* = वृद्धावस्था !

4 Comments

Sirji yah rachna Nind se jagati hai, vastvikta ka darshan karati tatha bhavishya ko sudrudh karne ki kamna bhi karti hai…..
sundar rachna hai sirji, badhai ho…..

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ashwini kumar goswami Reply:

@dr.paliwal,रचना की संवेदनशीलता
समझने का है ये बड़ा उपकार, जिसके लिए प्रकट करता हूँ मेरा हार्दिक आभार !

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jeewan saar ko satyata ke saath prastut karne par lekhak ko badhaayee.
ye sachchayee hai jo har chauthe ghar me dikhlayee padti hai.
beta paitrik sampatti ke batware ke liye to lalaayit rahta hai kintu un maa baap ke bare me kabhi nahi sochta jinhone use janma diya.kaash insaan paitrik sampatti ke saath saath mata pita ki jimmewari ko bhi baantne ke bare me vichaar karta.
sach to ye hai beti me maa baap ke prati dard hota hai wah unke budhape ke dard ko jis tarah samajh sakti hai waise bete nahi.
ek bahut hi sarthak rachna ke liye kavi badhayee ka patr hai.

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ashwini kumar goswami Reply:

@c k goswami, बहुत बहुत धन्यवाद,
चंद्रकांत जी, कविता के कुंठाभरे भावों के घावों को भरने में आपकी भावभीनतामय
टिपण्णी के लिए !

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