ana ko itni bulundi pe le gaye saare
अना को इतनी बुलंदी पे ले गए सारे
कि अपनी राह अकेले चले गए सारे
अदल का शोर बहुत था तेरी निजामत में
तो क्यूँ खिलाफ मेरे फैसले गए सारे
भरोसा खूब रखा सबने नाखुदाओं पर
भंवर कि सिम्त फ़क़त नाव ले गए सारे
किसी भी आँख में सालिम रहा न ख्वाब कोई
दिलों से जाने कहाँ वलवले गए सारे
जो अहले इल्म थे गलियां निकालीं मंजिल तक
और अहले हक के तईं फासले गए सारे
उन्हें पसंद न आई चमन की शादाबी
महल उठाये शजर काट ले गए सारे
बदल बदल के शबो रोज़ घर के आईने
मकीं हैं खुद को मुसलसल छले गए सारे

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