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एन आर आई माँ-बाप की व्यथा
एन आर आई माँ-बाप की व्यथा
(हम अपनी औलाद को पढ़ा कर तैयार कर देते है ताकि वोविदेश जा कर ज्यादा से ज्यादा कमाए
और अच्छी पोस्ट में पदस्थापित हो ,हममे से कई इसमें सफल भी हो गए हैं किन्तु सच में
ये सफलता नहीं,असफलता है क्योंकि हम उनके साथ विदेश में रह नहीं सकते और वो इस देश में वापिस लौट नहीं सकते क्योंकि जितना वेतन और सुविधाएँ उन्हें विदेश में मिल रही है ,वो इस देश में संभव नहीं.एन.आर.आई के माता पिता धन से तो संतुष्ट है किन्तु मन में असंतोष है दूरी का,साथ में ना रह पाने का,वृद्धावस्था में औलाद की सेवा पाने से वंचित होने का ,यह व्यथा ऐसे ही वरिष्ठ नागरिकों की है,जो कार बंगले फर्नीचर,नौकर की सेवा तो पा सकते हैं किन्तु अपनी ही औलाद के साथ सुख-दुःख
नहीं बाँट सकते.बीमारी में दवा/डाक्टर का खर्चा तो पा सकते है किन्तु औलाद की सेवा-सुश्रुषा नहीं)
बातचीत के कई हैं साधन,पर दूरी तो दूरी है
पैसों की नहीं कमी है फिर भी, मिलने की मजबूरी है
पढा के तुमको हम क्या पाए,दूर हो गए तुम हमसे
मिलन को नैना तरस गए हैं ,दूर हुवे हो तुम जबसे
ना मिलती सेवा अपनों की ,धन से प्यार नहीं मिलता
केवल पानी दे देने से कोई पौध नहीं खिलता
धन दौलत की कमी नहीं है ,तुमने वो भरपूर दिया
संग में रहके प्यार जो मिलता,इन पैसों ने दूर किया
कार,भवन,फर्नीचर सुख से ,बड़ा है नैन मिलन का सुख
अगर सामने अपने रहते, ना आते बीमारी दुःख
होली और दिवाली में जब , लोग मिलन को आते हैं
देख भरा परिवार सभी का,तरस तरस हम जाते हैं.
बेटे पोते पा कर भी हम ,बिन वारिस के जीते हैं
ख़ुशी दिखावे की हम करते,विरह के आंसू पीते हैं
नौकर से सेवा मिल जाती,अपनापन नहीं मिल पाता
मिलता संबोधन साहब का , पिता ना कोई कह पाता
बहू हाथ की बनी चपाती,अब तक भूल नहीं पाया
कौन परोसे वैसे थाली ,जो रुचिकर उससे खाया
महाराजिन तो बनाके खाना ,टाईम से रख जाती है
बिन अपनों संग कैसा खाना ,भूख नहीं लग पाती है
छड़ी व चश्मा देने वाला , अब पोता नहीं रहता साथ
पार्क घूमने जाऊँ कैसे , किसको बोलूं पकडे हाथ
किसे सुनावु परी कहानी , सुने कौन स्कूली बात
किसको संग सुलावु अपने ,किसकी खावु नन्ही लात
कौन कहेगा बाबा मुझको ,स्कूल छोड़ने तुम जाना
कलर पेन्सिल रबर कापी ,आज दिला के तुम लाना
सोच सोच के ऐसी बातें याद सभी की आती है
देख के अपना बंगला खाली,आँख मेरी भर आती है
तनखा थोडी थी बेटे की ,अपनों का सुख ज्यादा था
रहती थी खुश हाल जिंदगी,जीवन सुखमय सादा था
रोज शाम को बेटा दिखता,बहु की सेवा जारी थी
घर का खर्च चलाये कैसे उसकी जिम्मेवारी थी
आटे दाल का भाव है क्या ?पता नहीं था तुम थे जब
क्या लाना है ख़तम हुवा क्या ?ध्यान में रखना पड़ता अब
रात को आके हाल पूछना ,दवा दूध दे जाते तुम
रिश्ते नातेदार की बातें, करके दिल बहलाते तुम
बहुके मुख से पापा सुनके ,बेटी का सुख पाता था
बेटी विदाई भूल चुका ,जब सामने उसको पाता था
अब तो बस एकाकी जीवन याद मैं सबकी जीता हूँ
भौतिक सुख सारे हैं लेकिन बिन अपनों के जीता हूँ
धन दौलत बेकार की कारें ,सोना चांदी सब फीके
इच्छा अपनों के संग रह पावु सुबह शाम बस वो दीखे.
सोचके कम्पन होती है ,मर गया तो कन्धा देगा कौन
देखके अपनी हालत फिर मैं , धारण कर लेता हूँ मौन
मौन टूटता जब सुनता हूँ , फोन कीघंटी आती है
बेटे पोते बहु को सुनके ,तकलीफे उड़ जाती हैं
जब तक फोन में बाते होती, ख़ुशी से दिल भर जाता है
फोन के कटते एक बाप फिर, जिन्दा ही मर जाता है
बातचीत के कई है साधन,पर दूरी तो दूरी है
सब कुछ होते हुवे, नहीं कुछ , कैसी ये मजबूरी है
——-सी के गोस्वामी (चंद्रकांत)जयपुर
16 Comments
ज्ञात पङता है यह रचना आपने स्वयं की वास्तविकता का अतिशयोक्तिपूर्ण अहसास
होने पर अन्तरात्मा से लेखनीबद्ध करके प्रस्तुस की है ! बहुत ही संवेदनशील है
यह प्रस्तुति ! मैं भी इसी प्रकार से कुंठित हूँ, जब मेरे बेटे भी बाहर हैं, किन्तु
तदपि कुछ कुछ संतुष्टि हो जाती हैं जब हर सप्ताह एक या दो दिन के लिए ही
शनिवार-रविवार को आजाते हैं ! ५-सितारे संभवतः आपको तनिक सांत्वना
दे सकेंगे, जो इस प्रभावशाली लेखन हेतु वांछनीय हैं !
c k goswami Reply:
November 7th, 2009 at 10:15 pm
@ashwini kumar goswami, अश्विनीजी आपने अपने भारत में रहनेवाले बेटों की पांच दिन की अनुपस्थिति को भी सही ढंग से परखा है .शनिवार और रविवार को आपका चेहरा उन्हें देख कर प्रफ्फुल्लित हो जाता है और सप्ताह के पॉँच दिन बाहर रहने पर आपको अनुभव होती है उनकी कमी.
जिन माँ बाप की औलाद विदेश में है और जिनके पास सब कुछ होते हुवे भी बिना वीजा के उन तक पहुँच पाना मुश्किल है ,उनका क्या दर्द होता होगा ये वो ही माँ बाप जान सकते हैं.
धन से सब कुछ मिल सकता है किन्तु गैरों से अपनापन नहीं.कविता का यही कहना है. कविता को पढ़ा और उस पर विचार व्यक्त किये इसके लिए धन्यवाद्.
Resp.Chandrkant jee, I am unable to express my feelings from mouth as my eyes are speaking a lot – both the sides of face are wet – please dont mint I am leaving the computer as I have to wipe my………..May God give you the energy always for such kind of poetic creations-except my SALUTE for such a nice poem.
c k goswami Reply:
November 8th, 2009 at 12:08 pm
@sushil sarna, सुशीलजी आपके भावुकता भरे नमस्ते को स्वीकार करता हूँ. शायद जल्दी में आप accept की जगह except लिख गए हैं .
sushil sarna Reply:
November 8th, 2009 at 7:45 pm
@c k goswami,
You are very correct Sir please read the same as accept in place of except.
thanks
“naukar se sewa mil jati apnapan nahi mil pata
milta sambodhan sahab ka,pita na koi kah paata”
in do panktiyon ne hi aatmiya sambandh ko kitna bhari kar diya hai.vyatha
varnan ek marmsparshi bhavnatmak rachna hai .sundar rachna ke liye badhayee.
c k goswami Reply:
November 8th, 2009 at 12:14 pm
@Panch Ratan Harsh, लगता है आप भी भावुकता की लहरों में बह गए हैं.आपकी सराहना के लिए धन्यवाद्
wow, awesome!! I am speechless!! What a creation. Hats off sir. I am no one to give you stars but I would definitely rate it as one of the best poems I have read. If I had to give out of 5 I would give it 100!!
marvelous
c k goswami Reply:
November 10th, 2009 at 8:46 pm
@rajdeep, aapko pasand aayee,iske liye shukriya zanaab.

retired bank manager from central bank of india .
wrote few title songs for tv serials.
belongs to bikaner (rajasthan)
mobile 09785211353
बहुत सुन्दर रचना है, पर कुछ कुछ ये इक तर्फा है ,
इतनी सीधी बात नहीं ये. विचार इसपर होना है ,
जीवन में सब मिल नहीं सकता, चाहो ये कितना भी तुम .
जो मिलता है उसमे है सुख, यही मान कर चलना तुम,
वेदों में भी जिक्र है इसका, वानप्रस्थाश्रम कहें इसे,
ये भी सब इसके ही जैसा, अब प्यारे अपने दूर बसें
दुखी होकर दुःख बढ़ जाता, मिलता उसमे सुख मानो,
जो सब मिलकर यहीं बसे हैं, उनमे भी दुःख है जानो ..
इतनी सीधी बात नहीं ये, सब मत इस पर सर फोडो,
हर इन्सां का काम है, इसपर अपने मन से हल ढूँढो .
और जिस हाल में जो भी हल हो, खुश हो कर स्वीकार करो …
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c k goswami Reply:
November 7th, 2009 at 10:06 pm
@Vishvnand, मन के बहलाने के लिए आपने सांत्वना अवश्य दी है किन्तु ये सब विवशतावश स्वीकार्ययोग्य बातें हैं सच तो यह है की अपनों के संग दुःख सुख बाँट कर जीने का जो सुख है उसका कोई मुकाबला नहीं.
ये कविता इकतरफा नहीं है,यह सच्च्चायी है जिसे स्वीकार कोई करे या न करे . धन से नौकर की सेवाएँ ली जा सकती हैं पर अपनापन नहीं.धन से दवा और डॉक्टर को ख़रीदा जा सकता है परन्तु आत्मीयता नहीं.धन से भौतिक सुख उठा सकता है इंसान परन्तु अपनों की सेवा नहीं.
इस दर्द को जानना है तो उन माँ बाप से पूछो जिनके चेहरों में ख़ुशी तो मिलेगी किन्तु कृत्रिम .स्थानीय औलाद चाहे माँ बाप से अलग भी रहता हो या कैसा भी हो?माँ बाप को यह भरोसा रहता है कि उसका कोई अपना यहीं है.
इस कविता को लिखने कि प्रेरणा मुझे तब मिली जब मैं ऐसे माँ बाप से मिला जिनके बच्चे विदेश में हैं और वो उनके बंगलों में असुरक्षा कि भावना लिए बुढापे में उनकी सम्पति की सुरक्षा के लिए इन बड़े बड़े भवनों में डर कर के राते गुजारते हैं.अधिकांश माँ बाप के ये अनुभव हैं. सारे एन आर आई के माबाप के लिए मैं ये भावः व्यक्त नहीं करता.कुछ माँ बाप मुझ जैसे भी होते हैं जिनके बेटे उन्हें संग रहने के लिए बुलाते हैं किन्तु वो नहीं जाते क्योंकि उन्हें अपने माँ बाप की भी चिंता है उनकी देख रेख का ख्याल रखना पड़ता है.
आपने अपने विचार व्यक्त किये उसके लिए धन्यवाद्.
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Vishvnand Reply:
November 8th, 2009 at 11:38 am
@c k goswami
आपकी रचना बहुत सुन्दर है, इसमे कुछ विवाद नहीं है.
हम भी NRI सुपूत के माँ बाप हैं.
अगर NRI बेटा वहां जाकर माँ बाप को भूल गया हो, तो शायद जो व्यथा आपने विदित की है वो ठीक है. पर गर बेटा वहां रहकर भी अपने प्यार और कर्त्तव्य का पूर्ण ध्यान रख माँ बाप की ठीक से देखभाल और सेवा हो इसकी व्यवस्था करता रहता है, तो फिर माँ बाप को वो पास नहीं है इसलिए दुखी रहना और अपना ये दुःख बयान करते रहना बहुत ही अनुचित है और अपने प्यारे बेटे पर अन्याय है . उन्हें इस स्तिथि से खुशी से समझौता करना चाहिए, जो उनकी भी जिम्मेदारी है, ताकि उनके बेटे अपनी ओर से उत्साह से अपने career और कर्त्तव्य में खुशी से कार्यरत रहें. आजकल की internet और webcam जैसी सुविधाओं का परिपूर्ण उपयोग करें और इस स्तिथि में भी आनंदित रहें. ये स्थिति को विवशतावश स्वीकारने की बात नहीं है अपने परिवार के सुख और सम्रद्धि के लिए, खुशहाली के लिए खुशी से स्वीकारनेवाली बात है और कर्त्तव्य भी.
यह मेरे कमेन्ट का तात्पर्य था.
आग्रह है की आप NRI माँ बाप के इस विचार शैली और भावनाओं पर ,अपने NRI बेटों के ऐसे प्यार के प्रति भी एक कविता अवश्य लिखें …
अपने देश के लिए भी NRI बेटों का योगदान बहुत महत्त्व रखता है, इसे भी भूला नहीं जा सकता. शायद मैं मेरी बात और भावनाओं का विवरण कर सका हूँ.
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c k goswami Reply:
November 8th, 2009 at 12:03 pm
@Vishvnand, आपके विचार जानकर मुझे ख़ुशी हुयी.मैं भी अपने एन आर आई बेटे को पा कर गौरान्वित हूँ जो रोजाना मेरे संपर्क में रहता है,उसके उच्चस्तरीय पद को देख कर मुझे भी ख़ुशी होती है ,उसके कर-रहित वेतन देख कर मुझे भी आतंरिक प्रसन्नता महसूस होती है ,मैं ये नहीं कहता कि सबके माँ बाप आप और हम जैसे खुश नसीब हैं किन्तु आज भी एक कमी हमें सालती है कि हम चाहते हुवे भी बिना विज़ा के उसके पास नहीं पहुँच सकते.त्यौहार और सामाजिक उत्सवों में उसका सानिध्य प्राप्त नहीं कर सकते. रोजाना फ़ोन से संपर्क होता है और इस फोन संपर्क से ही जो ख़ुशी मिल जाती है उसको बयां नहीं किया जा सकता.
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Vishvnand Reply:
November 8th, 2009 at 1:13 pm
@c k goswami
आपके उत्तर का शुक्रिया.
और हाँ, मेरे आपसे अनुरोध का क्या ? NRI माँ बाप के एक अलग द्रष्टिकोण से इस स्थिति और बेटे के प्रयत्न और प्यार के प्रति आदर और सुख समाधान की सद्भावनाओं को दर्शाती रचना …
NRI बेटे भी इस विवशता में कुछ कम विवश नही हैं, उन्हें भी दिलासे की जरूरत है …
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