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BHARAT KI BETI
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सेना के एक वीर अधिकारी की छः वर्षीया वीर-पुत्री जब आँगन में अपने पिता की लाश देखती है. तो , उसकी देश-भक्ति, उसका तेवर, उसका आक्रोश, इस रचना में —
भारत की बेटी (बाल-कविता)
मां जी मुझको जाने दो , मैं भी रण-भूमी जाऊगी.
मैं भारत की बेटी हूँ , झांसी-रानी बन जाऊगी.
भारत माँ के शुभ्र-मुकुट पर जो भी आंख उठाएगा.
वो बर्फीली घाटी में ही वहीँ, दफ़न हो जायेगा.
अग्नि और आकाश मिसाइल दुश्मन पर बरसाऊँगी. मैं भारत ……….जाऊंगी.
हमको बच्ची समझो ना. मैं कभी नहीं डरने वाली.
मात्र मौत के भय से ही अपमान नहीं सहने वाली.
मातृभूमि की रक्षा में तो , मैं शहीद हो जाऊंगी. मैं भारत …………जाऊंगी.
निर्दोषों का अब धरती पर लहू नहीं बहने दूँगी.
दानवता को मानचित्र पर और नहीं जीने दूँगी.
परमाणु बम ले हाथों में. मैं उसका धुआँ बनाऊँगी. मैं भारत ………….जाऊंगी.
रचना —प्रदीप भारद्वाज ”कवि” मोदीनगर
०९४५६०३९२८५
अंतरे -बाकी


देश भक्ति की भावना से परिपूर्ण यह रचना बहुत पसंद आई. आपकी और रचनाओं का इंतज़ार रहेगा.
बहुत खूब, मनभावन ह्रदयस्पर्शी रचना,
बधाई,
“मात्र मौत के भय से ही अपमान नहीं सहने वाली”… सन्दर्भ में अतिसुन्दर
प्रदीप जी, बहुत मनभावन रचना है ! देश-भक्ति से भरपूर, मन को छू जाती है | बहुत सुन्दर शब्दों में बेटी की व्यथा व् आक्रोश व्यक्त हुए हैं |