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“खान-पान-पाचक है पान”

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Hindi Poetry
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अपनी तो इक पान की दूकान है,
आते-जाते सबसे ही पहचान है !  अपनी तो इक……….
 
कोई सादा खाता है, किसी का जर्दा-पान है,
भीड़ रहती  है लगी, फिर भी मुझे सब ध्यान है !
किसका है ये, किसका है वो, सब की ही पहचान है,
नकदी या खाते से चलता, अपना तो दिन-मान है !
 
शुरू में तो मेरी थी, छोटी सी ये दूकान जब,
इकन्नी में लेके खाता, हर कोई इक पान तब !
पांच रुपये में है मिलता वैसा ही इक पान अब,
और भी बढ़ सकती है दर, महंगाई बढ़ती रहती जब !
 
आज ये दूकान मेरी, हुई आलीशान  है,
सारी मेरी जिंदगी आमरण केवल पान है !
अपनी तो बस पान की दूकान है,
आते जाते सबसे ही पहचान है ! 
 
पान खाना या खिलाना रखता सबका मान है,
पान-दान घर में भी रखते  लोग जिनको गुमान है !
पास में रहता पड़ा चमचमाता पीक-दान है,
पान खाके थून्कते ही रहने में   उनकी शान है ! 
 
पान का इक नाम दूजा, लोग कुछ कहते बीड़ा,
है नहीं चिंता किसी को इससे दांतों में पड़ता कीड़ा !
दांत हिलते रहते,  होती रहती है  हरदम  पीड़ा ,
ज्यादा सेवन पान का कर देता  हमको  चिड़चिडा !
 
अति बुरी होती, सदा संयम रखो हर बात में, 
समय पर करलो सफाई, दिन में भी और रात में !
ताकि पड़ सके न कीड़े, हर किसी के दांत में,
पेस्ट-ब्रश  रखते रहो, जहां  भी जाओ,  साथ में !
 
सीख ये मेरी जो,  रखलो सदा ही ध्यान में,
मेरा तो जीवन है रत, बचपन से ही बस पान में !
आन से और शान से रहता सदा ही दुकान  में,
नियम से ही पान खाना  स्फूर्ति  देता जान में !
 
दूर-दूर तक है जाता मेरा बीड़ा-पान है,
अमरीका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, जापान है,
और भी सब दूर देशों में भी इसका  मान  है,
खान-पान पश्चात पान खाने में ही तो शान है !
 
अपना तो स्थायी धंधा, पान की दूकान है,
जिसके सहयोग में तो, सारा ही खानदान है !
अपनी तो इक पान की दूकान है,
आते-जाते सबसे ही पहचान है !  अपनी तो इक ………
                    *****************
अश्विनी कुमार गोस्वामी.,
जयपुर !

11 Comments

  1. c k goswami says:

    ” पान खानेवालों को, शान से पान खाना चाहिए
    जगह जगह न थूके,रखना ध्यान चाहिए ”

    अच्छी सीख दी है आपने .कविता के द्वारे
    सफलीभूत ये कविता होगी ,जो सीखें सारे

  2. Vishvnand says:

    बहुत सुन्दर मनभावन रचना,
    पान , पान की दूकान और पानवाले की पहचान, बहुत खूब… …

    जवानी के दिनों में मैं भी काफी पान का शौकीन था,
    कलकत्ता, बनारसी, मघई पान, खाता बड़े शौक से था,
    ऑफिस के पास का पानवाला भैया बना बड़ा दोस्त था,
    लंच बाद पान खाते उसकी बातें सुनने का मजा कुछ और था,
    वो भी सह्रदय मजेदार और अच्छा हास्य कवि और शायर था
    याद दिलाया इस कविता ने, सुन्दर से सारे उस माहौल का….
    बहुत बहुत धन्यवाद.

    • ashwini kumar goswami says:

      @Vishvnand, Yah kavita purane gaane
      ko sunakar likhee hai, jo shaayad Swargeey Mohd. Rafi Saheb ne Gaaya
      Thaa — “APANI TO HAR AAH IK TOOFAAN HAI,
      OOPAR WAALAA JAANKAR ANJAAN HAI…..”
      Vishnand ji aapako gaane ka hee to gyaan hai,
      Isako bhee gaakar ke dekho isame kitanee jaan hai ?

      • Vishvnand says:

        @ashwini kumar goswami
        हाँ वो गाना मुझे मालूम है, बहुत सुन्दर, शायद ” सोलवाँ साल ” का, देव आनंद और वहीदा रहमान पर फिल्माया गया, बर्मनदा का संगीत. ये आपका गीत उस धुन पर अच्छी तरह गाया जा सकता है, पर गीत के हिसाब से रचना ज्यादा बड़ी है. आप इसके कुछ stanza गाकर पॉडकास्ट कीजिये जी. आप तो खुद संगीत में निपुण हैं, शायद हम सब से कहीं ज्यादा.

        • ashwini kumar goswami says:

          @Vishvnand, Thank you very much, Dear
          Sir, for your accurately deciphering the old song. Presently, I am trying to
          provide my computor with podcasting facility, but for my present inability to
          gather it from local radio market, besides my being otherwise too busy.
          Hence, my request to you for the purpose. Pardon me for now.

  3. rajdeep says:

    a nice satire
    lovely

  4. Raj says:

    हालाँकि मैं पान नहीं खाता पर, जानता हूँ स्वाद क्योंकि मेरे पिता श्री जी को भी जानती मेरे पड़ोस की पान की दूकान है. सुन्दर लय में बह रही ये गाथा, कह रही कि – आपकी काव्य कुशलता पर मुझे गुमान है.

  5. Panch Ratan Harsh says:

    खान-पान के पश्चात पान ही सार्वजनिक रूप से एक पाचक वस्तु वास्तव में माना जाता है उसका इतनी सुन्दरता से गुण-दोष एवं संयम दर्शाते हुए प्रभावशाली रूप
    से वर्णन करना बहुत ही प्रशंसनीय है ! ५-सितारे वांछनीय हैं !

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