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अब कहाँ “लैला मजनू” “हीर राँझा” वाला जमाना रहा…….

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Hindi Poetry

मैंने यह रचना “शकील भाई” के स्टाइल में लिखने की कोशिश की है,
जानता उतनी अच्छी मैं नहीं लिख सकता, पर मैंने प्रयास किया है…..

 

दे गई जख्म कैसे, दर्द ए दिल की दवा,
जिंदगी में बचा है, बस धुआं ही धुआं,
राख हो गई फसलें, मुहब्बत के खलिहानों की,
खुशियों की न बारिश हुई, राह तकते रहा,
मरहम हमदर्दी की,न भर सकेंगी घाव मेरे,
बदन से मेरे ग़मों का, सैलाब ऐसे बहा,
आग समुन्दर में लगी हो, जलन ऐसी हुई,
बुलंद हौसलों का हिमालय, पत्तों की तरह ढहा,
तनहाई जमा चुकी है, वहां अपना डेरा,
सोचा था मिलकर रहेंगे, हम तुम जहाँ,
मुहब्बत उसकी ही थी, दवा मेरे दिल के दर्द की,
अब तो न वो रही, और न वो आलम रहा,
अरमानो के पंछी बसायेंगे, कहाँ अब बसेरा,
टूट गया घोसला उनका, बाकि कुछ न रहा,
ऐतबार न करना, झूठी बातों पर किसीकी “योगेश”
अब कहाँ “लैला मजनू” “हीर राँझा” वाला जमाना रहा…….

26 Comments

  1. Vandana Singh Mishra says:

    बहुत खूबसूरत रचना…

  2. swapnil says:

    kya baat bahot khob Yogesh…

  3. Vishvnand says:

    “ऐतबार न करना, झूठी बातों पर किसीकी “योगेश”
    अब कहाँ “लैला मजनू” “हीर राँझा” वाला जमाना रहा”
    फिर भी ये सच है, झूट नही, योगेश ,
    तुम्हारा ये प्रयास बहुत ही प्यारा खूबसूरत रहा .

    बड़ी सुन्दर रचना, हर शेर ताज़ा, अलग अंदाज का और बहुत बढिया .
    मज़ा आ गया, और आता ही रहा .
    बहुत बहुत बधाई.

  4. sushil sarna says:

    योगेश जी, सुंदर रचना, सुंदर भाव और सुंदर प्रयास – बधाई मैं आनंद जी से सहमत हूँ-रचना के लिए पुनः बधाई

  5. Parespeare says:

    superb poem Sir

  6. rajdeep says:

    aha!beautiful narration

  7. Shyam S Yadav कवि "कठोर" says:

    पालीवाल साहब ……..आप “शकील भाई” के स्टाइल……..से तुलना कर …दोनों की तौहीन कर रहे है …….!!!
    aap dono apne mein ” masterpiece” hai !!

    koi kisi ki barabari nahi kar sakta , jaise ki likhne aur na likhne ka koi reason nahi hota , bas sahi season hota hai !!!

    Hats off !!

  8. Raj says:

    वाह योगेश जी. आप इस शैली में भी अपनी ‘shell’ का मोती बने रहे. बहुत खूब.

  9. medhini says:

    Bhahut sunder. Liked the style
    and the poem.

  10. Ravi Rajbhar says:

    Dr. Saheb
    खूब-.बहुत खूब….
    दिल ही नहीं भर रहा ish रचना को पढ़- पढ़ के ……
    ऐतबार न करना, झूठी बातों पर किसीकी “योगेश”
    अब कहाँ “लैला मजनू” “हीर राँझा” वाला जमाना रहा…….

  11. neeraj guru says:

    पालीवाल जी,कई-कई भावों से सजी यह रचना,शकील के स्टाइल की नहीं हो पाई है और हो भी नहीं सकती है क्योंकि आपका अपना एक अलग ही अंदाज़ है और वहां भी झलकता है,पर आपने शकील जी को जो सम्मान दिया है,वह स्वागतयोग्य है,आखिर हम एक-दुसरे से प्रेरणा ही लेते हैं और ऐसा होना स्वाभाविक ही है.पर सच मानिये आपका अपना अंदाज़ भी काबिल-ए-तारीफ है.इस रचना में यही परिलक्षित होता है.

  12. बहुत बढ़िया पालीवाल जी , स्टाइल किसी की भी हो पर आपने बेहतरीन रचना लिखी है , सुन्दर ख्यालात को अति उत्तम शब्दों में पिरोया है आपने …

  13. Ravi Rajbhar says:

    janab इसे पढकर जी ही नहीं bharta …..एक बार फिर से बधाई..

  14. SAURAV GUPTA says:

    AAPKI POEM NE DIL JEET LIYA SIR JI…………

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