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तुम, मेरे सपने…..!

तुम, मेरे सपने…..!

जगे  जगे  हैं  कहते  हम  पर  सपनों  में  ही  रहते  हैं,
चाहे  जागें  चाहे  सोयें,   सपनों  में  ही  जीते  हैं…..!

जगा  हुआ हूँ  या सपनों में,  प्यार तुम्ही  से करता  हूँ
तेरे प्यार में  जीता  हूँ और तेरे प्यार पर मरता  हूँ ….!

जी  जी कर  मरना  है मुझको  तेरे सपनों  में जीकर
इस जग  में है नहीं मेरा कुछ  तेरे सपनों से बढ़कर…!

कैसे समझोगी तुम ये सच,  जो जीवन  को सच समझे  
और जो सपने  हैं असली सच,  उन्हें सिर्फ सपना समझे…!
 
कविता क्या है इक  सच  सपना,  जीना  है इस सपने में,
इन सपनों में    सबकुछ  पाता जीता यूं   तेरे  संग    में……!  
                                            

                                               —- ” विश्व नन्द ” —-

2 Comments

A beautiful love song.Loved it.

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Medhini,
Thank you very much to be the first to comment on this poem, which got written today itself and I loved the way it emerged..

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