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मैं कहाँ जाऊँ?

मैं कहाँ जाऊँ?

छाया जा रही है प्राची में खोने
हर मनुष्य अपने घर सोने
पशु पंची आसरा पाने

“मैं कहाँ जाऊँ ?”

निद्रा सुन्दर ख्वाब संजोने
रात खोया सवेरा ढूंढने
ठंडी हवा मन बहलाने

“मैं कहाँ जाऊँ? ”

मदिरा होंठो की तलाश में
नुमाइश आँखों की तलाश में
हवास बदन की तलाश में

“मैं कहाँ जाऊँ?”

प्रेम प्यास में बदलने
शोर सन्नाटे में खोने
पलकें भी लगी है अब बंद होने

“ मैं कहाँ जाऊँ?”

ह्रदय के स्पंदन अब बढ़ने लगे है
डर डर के मुझसे पूछने लगे है
“क्या सुबह की किरने कोई रास्ता दिखलाएंगी
क्या भोर, जीवन में रंग भर पायेगी
या फिर कल रात होगा यहीं हाल
हो के बेहाल तुम पूछोगे”

“मैं कहाँ जाऊँ?”

6 Comments

बहुत बढ़िया , लिखते रहिए …

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Swapnil Reply:

@THE LAST HINDU, अगर आप जैसे पढ़ने वाले मिले तो कोई कवी लिखना बंद नहीं करेगा. धन्यवाद .

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Achchhi rachana…..

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तुम्हें बोहत दूर जाना है स्वप्निल… बोहत दूर और कई भटके हुए लोगों को साथ ले जाना है
“मदिरा होंठो की तलाश में
नुमाइश आँखों की तलाश में
हवास बदन की तलाश में

“मैं कहाँ जाऊँ?”

बोहत बढ़िया..welcom tp,p4 My friend,,This is apltform For Swapnil,,,,Who Is unlnown to many Of us ,,,,,,,

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Swapnil Reply:

@rakesh, अगर तुम जैसे दोस्त साथ हो तो मीलों के फांसले भी करीब नज़र आते है.

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बहुत अच्छी, मनभावन,

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