प्रेम..
प्रेम..
एक मन में प्रश्न कौंधा, दो नयन अकुला गये!
तीन के बाद प्रियतम्, सामने तुम आ गये!!
फिर यकायक ये हुआ, कि चार नैना हों गये!
पांच तत्वो में अचानक, प्राण संचित हों गये!!
छह दिनो तक बस यूँ ही, इशारों में सब होता रहा!
सातवी रैना को मेरा, मन व्यतिथ होता रहा!!
आठ पन्नों में लिखा था, पत्र नौवें दिन तलक्!
मेरे मन में बस गयी थी, उसकी चंचल!!
प्रेम की सरिता बहाते, दिन गुजर जब दस गये!
बात है ये सत्य कि फिर हम उसके मन में बस गये!!
sudheer Pal “Sumer”
5 Comments
बहुत सुन्दर कविता, मनभावन कल्पना .
ग्यारवें दिन सोचा मैंने, क्यूँ ये दस मैंने गिने,
क्यूँ न हम गिनती ये फिर फिर एक से करतें रहें ….
sudheer ji rachna to bahut achchhi hai par 4th line ki closing kyon nahi ki..’mere mann me bas gayi thi, uski chanchal ’si jhalak’..
lekin vartika ji ne bilkul sahi kaha k ‘aapne to ungliyon par gin dala prem ka safar’..

I am journalist by profession...
aa! so sweet…
aapne to ungliyon pe gin daala prem kaa safar… bahut sunder kriti….
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