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तुम ही क्यों

मार के पत्थर सहलाते हो
फूलों से क्यों बहलाते हो

और ज़रा कुछ देर तो ठहरो
जाँ से पहले क्यों जाते हो

हम को चाहे ख़ुशियाँ कम हों
तुम क्यों ग़म से घबराते हो

प्यार का बदला ठुकरा कर दो
प्यार पे क्यों शक़ लाते हो

है क़दर ग़र प्यार की तुमको
बेक़दर क्यों कहलाते हो

दर्द क्या है दिल से पूछो
चोट यूँ ही क्यों खाते हो

जितना घायल कर दो हमको
उतना ही क्यों मुस्काते हो

‘सब्र’ हमको जो, वो तुम्हें हो
तुम ही जाने क्यों भाते हो

4 Comments

bhaut achi gazal..choti bahar aur poora khyaal mukkkmal laga

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Reetesh Sabr Reply:

शुक्रिया सखी!

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बहुत खूब, बड़ी मनभावन,
मजा आ गया.

तुम ही तो हो वो,
हमें हंसाते हो, रुलाते हो ,
मुझको यूं शायर बनाकर,
शायरी करवाते हो.

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“हम को चाहे ख़ुशियाँ कम हों
तुम क्यों ग़म से घबराते हो

प्यार का बदला ठुकरा कर दो
प्यार पे क्यों शक़ लाते हो”

प्यारी बातें :) सुंदर ग़ज़ल

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