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Band daravaajaa

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Crowned Poem, Uncategorized

बंद दरवाजा

देख कर बंद दरवाजे को ,
ठिठक गई है सहमी सी, मायूस सी,
बेताब सी, बैचैन रौशनी …….

खटखटाया उसने अन्धविश्वासों की मोटी सांकल,
कुंडी, और जंग लगी सिटकुनियां …..
तोड़ना चाहा परम्पराओं और अवसादों की
मोटी बल्लियां ……..
बंद थी धर्मान्धता की खिड़कियाँ भी………
कुछ भी टस से मस नहीं हो रहा था…..

फिर कही से आया एक झोंका हवा का,
द्रढ़ निश्चयी, आग्रही ने हाथ थामा रौशनी का,
टूट गयी सांकल, गिरने लगी बल्लियां,
खुल गयी चिटकुनी चरमराया बंद दरवाजा,
फ़ैल गयी रौशनी यहां वहां इधर उधर……

सबने हवा को सलाम कर खुदा कहा,
हवा हँसी, अरे! वह तो साक्षरता थी…….

सुधा गोयल ”नवीन”

8 Comments

  1. vartika says:

    bahut bahut sunder…..

    • sudha goel says:

      @vartika,
      धन्यवाद वर्तिका,
      सुन्दर के अर्न्तगत क्या क्या आता है?
      सुधा गोयल

  2. shakeel says:

    सुन्दर के अर्न्तगत आपकी ये रचना आती है.
    आपकी मासूम सोच भी उसकी सरहद के अन्दर है.
    जिसमें आपकी ये सुन्दर रचना है,
    बेहद मनभावन
    कृति…

    • sudha goel says:

      @shakeel,
      धन्यवाद शकील,
      कोशिश करूंगी और सुन्दर रचना पेश कर सकूं .
      सुधा गोयल

  3. Arvind Jain says:

    बोहोत खूब

  4. Vishvnand says:

    Fantastic and beautiful. अति उत्तम
    हम प्रार्थना और आशा करेंगे की उस हवा के झोंके ने जो रोशनी के आग्रही हांथों को बल दिया है और बंद दरवाजा खोल दिया है वो हर जगह लगे जंग को भी जड़ से मिटा दें …

    • sudha goel says:

      @Vishvnand,
      आदरणीय विश्वानन्द जी,
      आपकी सराहना बहुत प्रेरित करती है.
      सुधा गोयल

  5. medhini says:

    Bhahut sunder kavita.

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