« »

बोझ भारी……..

2 votes, average: 5.00 out of 52 votes, average: 5.00 out of 52 votes, average: 5.00 out of 52 votes, average: 5.00 out of 52 votes, average: 5.00 out of 5
Loading...
Hindi Poetry

यह एक सत्य घटना है जिसको मैंने कविता के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है,
इस तरीके की घटनाएँ संभवतः काफी लोगों ने अनुभव की होगी…….
यह रचना मैंने “मराठी” में लिखी थी परन्तु सभीको “मराठी” में पढना संभव नहीं होगा,
इसीलिए इसे मै “हिंदी” और “मराठी” दोनों ही भाषाओँ में प्रस्तुत कर रहा हूँ……

बोझ भारी……..

क्या बताऊँ बेटे, कैसा जीवन मै जिया,
एक एक पैसेके लिए, कैसे मैं छटपटाया,
जब मिला काम, पेट भरके खाया,
नहीं मिला काम, तो भूखा ही सोया,
उपरवाला भी, पैसेवालोंको ही भरपूर देता है,
हम गरीबों के पास, कुछ रहा वह भी ले जाता है,
तेरे लिए बेटे, मैंने क्या नहीं किया,
एक समय भूखा, रहकर तुझे पढाया,
फटी धोती और, नंगे बदनसे से मै रहा,
सिरपर भलेही, कपडोंके गठ्ठे मैंने ढहा,
ऐसे ऐसे दिन, मेरे लाल मैंने देखे,
समझ नहीं आता, क्या पाया मैंने जीके,
ऊपरसे मुझीसे पूछता है, क्या मेरे लिए किया,
मेरे लाड प्यार का बेटे, तुने अच्छा सिला दिया,
निभाया मैंने तुझसे, है बाप बेटेका नाता,
मुझे बाप कहने में, है तेरा क्या जाता,
तोड़ता हूँ मैं ही तुझसे, सारे नाते रिश्तेदारी,
क्या करूँ उसका बाप रहकर, जिसे बाप लगे बोझ भारी………

ओझं………….

काय सांगू दादा, कसा जीवन मी जगलो,
एका एका पैशाले, कसा मी तगमगलो,
जवा भेटे काम, तवा पोटभर मी खाऊ,
नाय भेटला काम, त उपासी मी राहु,
देवही पैसेवाल्याइलेच, भरभरून देते,
आमा गरीबाइकड़, काही राहिलं तेहि घेउन जाते,
तुह्यासाठी पोरा, मी काय नाय केलं,
एक डाव उपासी राहून, तुले शिक्षण मी दिलं,
फाटकी धोतर अन, उघड्या आंगान् मी राहु,
डोस्क्यावर लागन त, कपडयाइचे गठ्ठे मी वाहू,
असे असे दिवस, माह्या राज्या मी पाह्यले,
कायले जगत राह्यलो, समजत नाय च्या मायले,
वरून मलेच इचारतेस, काय माह्यासाठी केलास,
माह्या प्रेमाचा लेका, चांगला मोबदला दिलास,
निभावलं मी तुह्याशी, बापलेकाचं नातं,
मंग मलेच बाप म्हणiयले, तुह्य काय जातं,
तोडतो च्या बहिन मीच, तुह्याशी नातं माझं,
काय करू त्याचा बाप होउन, ज्याले बापच वाटते ओझं……….

19 Comments

  1. P4PoetryP4Praveen says:

    योगेश जी, सचमुच अत्यंत भावपूर्ण है आपकी रचना…और आज की कड़वी सच्चाई भी…आशा है इस कविता से सभी प्रेरित होंगे… 🙂

    5***** 🙂

    • dr.paliwal says:

      बहुत बहुत धन्यवाद प्रवीणजी…….
      क्या बात है? काफी दिनों बाद p4 पर आप मिल रहे हैं…….

  2. sushil sarna says:

    तोड़ता हूँ मैं ही तुझसे, सारे नाते रिश्तेदारी,
    क्या करूँ उसका बाप रहकर, जिसे बाप लगे बोझ भारी………
    बहुत सुंदर, हिर्दय स्पर्शी रचना, जैसे कोइ निर्मल सूर्य रशिमी स्वयम में धूप की तपिश के कठोर सत्य को छुपाये धरा पर अपनी रोशनी बिखेर रही हो, एक पीडी की कसक को वर्तमान के आईनें में ढाल कर काव्यत्मक रूप में पेश करने के लिए आप बधाई के पात्र हैं आपकी ये लाईनें इस रचना का सार हैं : तोड़ता हूँ मैं ही तुझसे, सारे नाते रिश्तेदारी,
    क्या करूँ उसका बाप रहकर, जिसे बाप लगे बोझ भारी………

    • dr.paliwal says:

      सरजी बहुत बहुत धन्यवाद……..
      आपकी इतनी अच्छी टिप्पणी पढ़कर मैं गदगद हो गयाजी…..
      पुनः धन्यवाद……..

  3. Vishvnand says:

    बहुत प्यारी, बहुत भारी, ह्रदय पर प्रहार करने वाली , अति सुन्दर सटीक रचना. लगा जैसे मैं एक बाप के जीवन का विडियो ही देख रहा हूँ .
    ये मनभावन, कटुसत्य समझानेवाली कविता उत्तमोत्तम प्रशंशा की पात्र है, और मराठी की बाप की भाषा में original कविता तो और भी प्रभावी लगती है .
    इस दुर्भाग्य से समझ में आता है की सपूत का बाप होना कितने सौभाग्य की बात होती है…..
    रचना के लिए बहुत बहुत बधाई ….

  4. Acchi rachna hai …

  5. Ravi Rajbhar says:

    नमस्कार YDP जी….
    समाज के कठोर सत्य से नहाई आप की यह कवित दिल को छू गई…..
    पर समाज में कुछ yese bachche भी है jinko अपने बाप का प्यार नहीं मिलता….
    उन bachcho को आप kisaka bojh manegen ..(यह kawita पर मैंने नहीं कहा है )
    आपकी kawita बहुत दर्द samete हुए है…..बधाई हो…

  6. medhini says:

    Sunder, komal aur savishesh rachna.

  7. krishna says:

    Dr. Paliwalji loved this one…
    Thank you for posting it…
    a good write for an ungrateful son…

  8. पालीवाल जी
    जीवन का सत्य यही है ।यथार्थ का चित्रण एक सबक है ।
    धन्यवाद ।
    कमलेश कुमार दीवान

  9. Preeti Datar says:

    Khoobach bhavuk rachana 🙂

Leave a Reply


Fatal error: Exception thrown without a stack frame in Unknown on line 0