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***वक्त बदल गया…***

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Hindi Poetry

सच कहते हैं लोग
कि वक्त बदल गया
वक्त के साथ इंसान का
रक्त बदल गया
नहीं कीमत रिश्तों की
अब उसकी नजर में
जिन्दगी के आईनें का
हर अक्स बदल गया
सच कहते हैं लोग कि
वक्त बदल गया…..

अब जिन्दगी के साज़ में
खुशियों के नग्में ही नहीं
बागबाँ बिचारा क्या करे
बहारों का मौसम बदल गया
सच कहते हैं लोग
कि वक्त बदल गया…..

लिपटे रहे दामन से उनके
देर तलक कल रात को
हुई सहर तो ख्वाब टूटा
जाम लबों का बदल गया
सच कहते हैं लोग
कि वक्त बदल गया
वक्त के साथ इंसान का
रक्त बदल गया,रक्त बदल गया….

सुशील सरना

 
 

14 Comments

  1. priyal says:

    सच कहते हैं लोग
    कि वक्त बदल गया
    वक्त के साथ इंसान का
    रक्त बदल गया…

    bahut khub..

    • krishna says:

      सच कहते हैं लोग
      कि वक्त बदल गया
      वक्त के साथ इंसान का
      रक्त बदल गया…
      Beautiful lines… loved it…

    • sushil sarna says:

      priyal जी, bhut bhut शुक्रिया फॉर liking lines

  2. dr.paliwal says:

    Bahut khoob………..
    Achchhi rachna hai…………

    • sushil sarna says:

      आपके aasheervaad का shukriya

      • dr.paliwal says:

        Sirji aap hume aashirvaad dijiye, Hum to bas shubhkamnaye de sakte hai aapko…..

        • sushil sarna says:

          डा.paaliwal जी, hmnen aapse अपनी rchna के लिए aasheervaad manga था अपने लिए nheen, और hmara aasheervaad तो sada आपके साथ है-dhnyvad

  3. Raj says:

    अच्छी रचना सूशील जी. वक़्त के साथ इंसान के खून का रंग फीका पद गया है और अब वो जज़्बात नहीं रहे रिश्तों, दोस्ती और इंसानियत के लिए जो कभी हुआ करते थे. nice said
    “अब जिन्दगी के साज़ में
    खुशियों के नग्में ही नहीं
    बागबाँ बिचारा क्या करे
    बहारों का मौसम बदल गया”

    • sushil sarna says:

      राज जी, रचना में छुपे भावों के आदर के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया

  4. prachi says:

    exact depiction of today’s time….very true said….awesome poem sir ji..

    • sushil sarna says:

      प्राची जी, मेरी रचना के भावों को आपने मान दिया-धन्यवाद

  5. Vishvnand says:

    बहुत अच्छी रचना, बहुत मनभावन.
    बधाई …..
    लेकिन क्या ये सच है की रक्त बदल गया है और रक्त दोषी है .
    इंसान ने खुद अपनी नियत हर दिशा में बदल दी है, क्यूँ हम रक्त को दोष दें. इसमे बेचारे रक्त का क्या कुसूर,

    • sushil sarna says:

      श्री वी.आनंद जी, रचना की दाद देकर आपनें उसे और भी खूबसूरत बना दिया है – रही बात रक्त बदलनें की तो रक्त कहां बदलता है इंसान के अपने कर्म रक्त को बदनाम कर देते हैं और ऐसे अवसरों अक्सर कहा तो यही जाता है कि अरे , इसके तो खून में ही मिलावट है या इसका तो खून ही पानी हो गया या ये तो खून से ही राजा है आदि आदि तो संक्षेप में रक्त तो कर्मों के लपेटे में है – यदि बुरा लगा हो तो क्षमा a

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