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ग़र्मी-गरीब की

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Anthology 2013 Entries, Hindi Poetry, Podcast

3938
 
हाथ उठाये , गुहार कर रहे उस रब से,
बख्श दे, हे दाता, बख्श दे,
अब नहीं है शक्ति, सहें हम तेरे आक्रोश को,
बख्श दे, कुछ जीने दे न अब इस गरीब को|

नहीं हैं मेरे पास सुविधाओं के भण्डार,
छत भी मेरी जो है, सब है तारो-तार,
कैसे बचूं सूर्य देवता की अग्नि-वर्षा से,
क्या करुँ जो परिवार जीए सुख चैन से?

गला सूख-सूख, कड़वे घूँट ही पी पाता,
मंझधार में डोलता मैं, हे मेरे जन्मदाता |
कहाँ मुमकिन कि शीतल जल भी हो नसीब,
अगले जनम , हे ईश , मुझे न बनाना गरीब|

जलता है मेरा तन तेरे क्रोध की बारिश में,
झुलसता है मेरा मन, असफलताओं की साजिश में |
ख़्वाबों की परत तमन्नाओं के द्वंध में है उलझी,
यह द्वंध-प्रतिद्वंध आज तक न सुलझा सका यह गुत्थी —
की कैसे दूर हो, जलते हुए, मजदूरी की यह मजबूरी,
कैसे करुँ मैं जीने की आवश्यकताएं पूरी?
कैसे छाँव बनूँ अपने बच्चों पर बादल सी,
कैसे ठंडक दूं उन्हें बर्फीली हवाओं की?

कैसे कहूँ की जीओ इस कुलबुलाते माहोल में?
कैसे कहूँ, मनुष्य हो, न खाओ कुक्करों की झूठ से–
जिसको है न आस, न मनुष्यता का गुरूर,
गरीब हूँ, मनुष्य हूँ, यही है क्या मेरा कुसूर?

नंगे पाँव जब आग उगलती सड़क पर चलना पड़ता है,
मुझे लगता है मुझसे बेहतर वह कुत्ता है जो छाँव में बैठा है,
कम से कम रोजी-रोटी की फिक्र से तो आजाद है,
मेरे जैसे जीवन का क्या करता जो हर पल ही हताश है|

13 Comments

  1. seema says:

    Touching and true… well done Parminder!

  2. vartika says:

    hello di! i liked ur approach towards the theme… but i feel ki थोडी और पोलिशिंग की ज़रुरत है इस रचना को… d thoughtline is gr8… if u just re-wrk a bit on the xpressions, to yeh aur bhi sttrong ho sakti hai….

    a few suggestions….
    “जलता तन, दाने-दाने हो जाता है,”…. इस पंक्ति में तन का दाने दाने होने वाला xpression ठीक नहीं लगता… kyun theek nahin lagtaa ye shayad mein justify naaa kar paaon…par phir bhi

    aur ek baat “इस धुप में मजदूरी की जो मजबूरी है,
    जीने की तमन्ना को भस्म कर जाता है”

    दी ये पंक्ति gramatically correct नहीं है… क्यूंकि ‘मजबूरी’ के साथ “भस्म कर जाती है आना चाहिए”…

    और last line “मेरे जैसे जीव का क्या करता जो जानवर क्या, मनुष्य से भी परे है|”, यह पंक्ति भी शायद ठीक से स्त्रुक्टुरे नहीं हुई है….

    regarding d podcast, i wud say dat no doubt u have a very lovely voice, but still d podcast cud have been mch better… d last podcast, d one dat won in d contest, was awesome… :)

    hope i m not being too critical
    with regards

    • parminder says:

      Vartika, I appreciate the guidance. I don’t think this should be considered as criticism. How else would we grow? Regarding दाने-दाने, मेरा मतलब था कि जब गर्मी ज्यादा होती है तो घमोरियां होती हैं ना? Rest I’ll try and correct . Thanks. :)

    • parminder says:

      done some modifications, waiting for your comment.

  3. Parespeare says:

    a very heart rendering and piercing poem on the plight of poor in the scorching sun heat

  4. rajdeep says:

    aha really its so nice to read
    i loved it ma’am

  5. parminder says:

    Medhini,Parespeare,Rajdeep, thank you for the appreciation.

  6. sushil sarna says:

    भाव सुंदर हैं लेकिन अगर थोड़ी मेहनत और की होती तो गरीबी का चित्र कविता के कैनवास पर जीवंत हो जाता-प्रयास अच्छा है

  7. ashwini kumar goswami says:

    Dear Parminderji,
    Lok-Tantra men Log-Tang hain, poore kue men padi Bhang hai,
    Hosh men aao, Josh me laao, Ham bhee aapke sang-sang hain.
    AKGOSWAMI.

  8. renu rakheja says:

    A very good attempt but a bit of polishing and editing will make it really great.

    • parminder says:

      Hi, Thanks for the comment and appreciation. Have tried to change a bit, see if that makes it better?

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