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हाथों में शस्त्र धर लूँ मैं……

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Hindi Poetry

एक आहट सी आयी अजीब ,
डर की लहर छाई मनमे,
बिजली सी दौड़ पड़ी तन में,
रुका एक क्षण पड़ा मै गहरी सोच में,
दिल बोला……
आहट जानी पहचानी ही होगी,
शायद कोई नई कहानी होगी,
दुविधाओं को बुनना छोड़ दो,
हवाओं का रुख मोड़ दो,
चल दिया मै उस और,
जहाँ से यह आहट आयी थी,
शायद आश्वासनों की,
अपनी सोच पर उनकी सोच,
लादकर कर लाचार हो चलने की,
आहट थी वह चुनाव की,
देश को फिर, अल्पसंख्यक,
धर्म और जाती के नाम पर,
बांटने के द्वंद की ही थी शायद,
या थी “आश्वाशन” के छटपटाने की?
जो इनके भाषणों के जाल में,
ताउम्र के लिए फंस चूका है,
लाचारी की गहरी खाई में धंस चूका है,
रुख कैसे मोड़ सकूँगा हवाओं का?
क्या इनसे दुर्बल हूँ मैं?
या मनकी दुर्बलता के हाथों हूँ मजबूर?
ठीक वैसेही जैसे “आश्वासन”
क्या मैं एक एक करके सबको जोड़,
बदल नहीं सकता हालात?
क्यूँ प्रयत्नों के बिना,
हार स्वीकार कर लूँ मैं?
क्यूँ न देश की आन की खातिर,
हाथों में शस्त्र धर लूँ मैं?

12 Comments

  1. kamleshkumardiwan says:

    कविता acchi हे .kalam भी एक sastra हे .कविता लिखते रहे .

  2. Vishvnand says:

    भई वाह, सुन्दर कविता. मनभावन और बिलकुल उपयुक्त.
    कविता के विचारों से आदरयुक्त पूर्ण सहमति.
    बहुत बधाई और हार्दिक अभिवादन

  3. Reetesh Sabr says:

    दीवान जी की बात से सहमत हूँ, कलम ही सबसे बड़ा शस्त्र है रचनाधर्मी के लिए, रामधारी सिंह दिनकर जी प्रणेता हैं हमारे!

    • dr.paliwal says:

      जी बहुत बहुत धन्यवाद……
      मैं भी आप लोगों से सहमत हूँ….

  4. Sudha says:

    Good one.. Paliwal Ji..

  5. Parespeare says:

    a very nice poem Paliwalji as always
    -:)

  6. kya bat hai sir…
    kamal ka likha hai aapne , suchmuch desh ki maujuda halat kuchh yesi hi hai.

  7. dr.paliwal says:

    Thanks…..

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