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काहें की ज़ंग

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Hindi Poetry

ज़मीन के टुकड़े टुकड़े के लिये
भाई से भाई लड़ा
देश से देश भिड़ा,
मगर आकाश तो सभी का था
बस ऊची उदान भर कर
जितना चाहे जीत लो |

परंतु दूरदर्शिता कम मात्र में दिखती है
और परो में इतना जोर नहीं
इसी लिये जमीन को ही बाटकर
इंसान खोटे सुख में जीता है|

11 Comments

  1. dr.paliwal says:

    ACHCHHE VICHAR, ACHCHHI SOCH, ACHCHHI RACHNA….

  2. Vishvnand says:

    सुन्दर कविता, सुन्दर कल्पना. मनभावन
    अब लोगों को और देशों को ये पता चल गया है, तो शायद आकाश भी बाटने की तैयारी चल रही है. मेरा airspace, तुम्हारा airspace 🙂

  3. Reetesh Sabr says:

    मैं तो शाब्दिक त्रुटियों पर तुम्हारा ध्यान दिलाना चाहूँगा, उदान को उड़ान कर दो और मात्र को मात्रा…
    कविता का विषय तो रोचक है ही, लिखा ठीक-ठाक है!

  4. parminder says:

    वाह क्या विचार है ! अभी कुछ कसार है क्या जो आसमान भी बांटने का सोचेंगे? सुन्दर प्रस्तुति|

  5. medhini says:

    Very nice and simple.

  6. Parespeare says:

    there is air space, there is water (sea,ocean)space as well
    very nice poem Preeti
    -:)

  7. vartika says:

    its awesome….. इतने कम शब्दों में तुमने सारी tasveer itni suljhaa ke rakh di…tasveer bhi…. sawaal bhi…jawaab bhi… 🙂

    door darshitaa shayad aisi hi hoti hai… 🙂

  8. ravi rajbhar says:

    छोटी सी रचना पर बात बहुत बड़ी कही है अपने , बहुत ही सुंदर ….

  9. Preeti Datar says:

    Thanks everyone 🙂

  10. Reetesh Sabr says:

    काहें की जगह काहे कर दो प्रीति…इस बाँट-छांट में ध्यान थोडा बँट जाता है 😉

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