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चिर दे आसमानों को वफ़ा रखती है असर अपना

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Crowned Poem, Uncategorized

आए कहाँ से है जाने कहाँ तक अब सफ़र अपना
हथेलियों पर नहीं राहों पर लिखा है मुकद्दर अपना

जुनून जुस्तजू है जो दम पल का लेने नहीं देती
जो मंजिलों से घबरा गया है दिल बेखबर अपना

उंगलियाँ यूँ तो कई बार उठी है इस दीवाने पर
सर झुकाए करता है सजदे खामा काग़ज़ पर अपना (खामा- कलम)

इश्क का दम भरो तुम मुझसे ऐसे नादान तो नहीं
चिर दे आसमानों को वफ़ा रखती है असर अपना

छलके जो हर लहर के साथ आशिकी वो तो नहीं
खामोश है हम खामोश है ज़ज्बों का समंदर अपना

दो दिलों के बीच जो बात हो अच्छी हुआ करती है
उस शोख के दिल के बाद एक दिल हो मगर अपना

बहारों के मौसम में लहू से यूँ तरबतर हुए शकील
हवाएं दामन में यादों का लिए फिरे जैसे नश्तर अपना

5 Comments

  1. rajdeep says:

    bahut khoob

  2. kalawati says:

    छलके जो हर लहर के साथ आशिकी वो तो नहीं
    खामोश है हम खामोश है ज़ज्बों का समंदर अपना

    वाह आप कमाल लिखते हँ

  3. dr.paliwal says:

    बहुत खूब शकीलभाई…….

    कौनसा है जादू तुम्हारी कलम में यार शकील….
    जो लिखा है,लगता है दिलसे निकला लब्ज अपना…

  4. Vishvnand says:

    Kyaa Baat hai, Mazaa aa gaya.
    Your style of writing Nazm & the throw of words in it is fantastic to say the least.
    Shakeel Bhai, well done &pl keep it up

  5. Mudit says:

    Bahut khoob shakeel ji…

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