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छलके जब आँखों से ज़हरे गम तो ग़ज़ल कहते है हम

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Crowned Poem, Hindi Poetry

छलके जब आँखों से ज़हरे गम तो ग़ज़ल कहते है हम
हो जान लबों पर वक़्त बेरहम तो ग़ज़ल कहते हैं हम

यूँ तो है गम तुम को भी मुझ सा ही कमो-बेश
तरतीब से मिले जब ज़ख्म तो ग़ज़ल कहते हैं हम

(तरतीब-सिलसिलेवार)

बढ़ आयें जब साये शाम के और दिल हो बेनूर अपना
रो पड़े कागज़ पर जब कलम तो ग़ज़ल कहते हैं हम

कभी पढ़ा था गालिबो मीर के दर्द को बहुत मैंने
वही जारी हो जब सितम तो ग़ज़ल कहते हैं हम

झुकाकर सर बना दिया पत्थर को भी हमने सनम
बने जब पत्थर के सनम तो ग़ज़ल कहते हैं हम

जिनकी खातिर कभी दानिश्ता भी खताएं की थीं
मिले वही मुन्सिफे बेरहम तो ग़ज़ल कहते हैं हम

(दानिश्ता-जान बुझ कर ) (मुन्सिफे-फैसला करनेवाला )

होशे तौर ग़ज़ल ख्वानी अब कहाँ से लायें शकील
मुझपर इल्जाम बेबेहरो रसम ग़ज़ल कहते हैं हम

(होशे तौर ग़ज़ल ख्वानी-ग़ज़ल कहने का तरीका )
(बेबेहरो रसम-ग़ज़ल के मीटर को बहर कहते हैं )

5 Comments

  1. shakeel ji kya gazab ki gazal hai ‘bahot sundar’

  2. raj says:

    bahut acchi hai

  3. VishVnand says:

    बहुत खूब, बहुत बढिया.
    शकील भाई, कैसे और कहाँ से, हमें नही मालूम,
    आप जो भी लिखें,
    एक से एक बढिया ग़ज़ल है, कहते है हम….!

  4. seema says:

    Beautiful ghazal..झुकाकर सर बना दिया पत्थर को भी हमने सनम
    बने जब पत्थर के सनम तो ग़ज़ल कहते हैं हम.. wonderful words….

  5. s c kakar says:

    beautiful.well put together.explaining difficult urdu words is a marvellous idea.

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