Quick Links: English Poetry | Hindi Poetry | Poetry Podcasts | Editor's Pick | Forum
Email This Poem |
« »

कम होती आवाज

अब आवाज कुछ कम हो चली है.
अब हम भूल गये हैं.

पहले, जब सब चिल्ला रहे थे -
मैं चुप था.
आखिर करोड़ों की आवाज से एक घट जाये
तो हानि क्या?

नहीं नहीं! मैं अपने दायित्व से मुँह छुपाये बैठा ना था.
मैं जमा कर रहा था – ऊर्जा.
असीम ऊर्जा.
क्युँकि मैं जानता था कि करोड़ों कंठ,
जल्दी ही थक – चुप हो जाने वाले हैं.

मैं जमा कर रहा था ऊर्जा – उस वक्त चिल्ला सकने के लिये.
आखिर संख्या जब नगण्य हो जायेगी -
धीरे चिल्लाना, किसे सुनाई पड़ेगा?

लोगों की याद्दाश्त पर मुझे कभी भरोसा नहीं रहा.
कल भी नहीं था, आज भी नहीं है.

लोग तो बस एक सप्ताह चिल्लाते हैं
फिर पड़ोसियों को गालियाँ देने के बीच
आसानी से अपनी अक्षमता भुला देते हैं.
मोमबत्ती ले कर सड़को पर घुमते हैं
और उस दीप में अपना गुस्सा जला देते हैं.

‘ज्यादा देर तक गुस्से में रहना ठीक नहीं’ -
की वकालत करने वाले लोग,
शांति की बातें करने लगते हैं -
तब तक, जब तक कोई फिर हमारे घर के चिथड़े ना उड़ा दे.

शांति के पक्षधर होने के गर्व में -
हमें घर में अशांत बैठी माँ नहीं दिखती.
सफ़ेद झंडे भी तो विधवा बहन की साड़ी से ही बनते है ना?
और बूढ़े बाप का रोना कौन सुने?

आखिर पेट है
कब तक शोक में डूबे रहें?

आखिर पेट है
क्रांति के झंडे खाये तो नहीं जा सकते?

आखिर पेट है
मेरा भी, और मेरी बीवी बच्चों का भी.
सो भूलना तो पड़ेगा ही.

आखिर पेट है
ना भरे, तो चिल्लाना रुक जाता है
और भरा हो – तो चिल्लाने की जरूरत नहीं होती.

आखिर पेट है -
और साथ में कई अच्छे बहाने भी है.
सो, आवाज कुछ कम हो चली है.
मुझे तो लगता है कि कोई है -
जिसके पेट में आवाजें भी समाती जा रही हैं.

कभी कभी किसी भरे पेट से
डकार की आवाज आती है -
वो भी जोर से नहीं, बहुत धीरे.
धमाका नहीं होता -
आतिशबाजियों-सा शोर नहीं होता.

बमों का धमाका अब पचने को है
२६/११ भी इतिहास हो गया.

13 Comments

प्रशंसा के सारे शब्द, अपने ही आप खुश होकर उमड़ पड़ें, ऐसी यह एक अति सुंदर रचना.
मन को व्यथा और आनंद दोनों से भर देनेवाली रचना.
सच, जितने तारे चाहें समेट लीजिये, इतनी तसल्ली देनेवाली रचना.
प्रशंसा से जियरा नही भर रहा !!!

Comment on this comment

Vikash Reply:

@VishVnand, मैंने कहा था ना कि आब जब भी बड़ाई करते हैं – ऐसा करते हैं कि क्या कहें. :) बहुत बहुत आभार!

Comment on this comment

VishVnand Reply:

विकाश,
मैं कुछ नहीं करता, बस कविता पढ़ने पर जो मन से भावनाएं उभरती है उन्हें जैसा बन सके, लिख देता हूँ , और यही सत्य है.

Comment on this comment

हम तो दिवाने हो गये

Comment on this comment

Good one Vikash ! So ironical but true… the rhetoric/discussions/ debates all have simmered down to occasional whimpers….as always!!!!!

this has been well essayed in our poem and the subtle sarcasm further accentuates the impact!!

Comment on this comment

Vikash Reply:

@seema, Thanks a lot mam for your valuable comment.

Comment on this comment

seema Reply:

@seema, *Your..sorry typo error..

Comment on this comment

Vikash Reply:

@seema, its okay. :)
It was mine, when it was in my mind. The moment, a poet write and publish a poem, its not His anymore. :D

Comment on this comment

Kaam hoti Awaz…….Yes true you are right….you have to get out of all the daily “much-much” and gather all energy and come up good in life to do all the good things……..

Yes, your poem goes outright and blames all and everyone for their part of the wrong doings and asks oneself to realize the righteousness.

Stars = 4

Comment on this comment

सही कहा है जब पेट की आग जलती है तो नजर किसी और आग की तरफ जाती ही नहीं । हम सब अपनी ही उलझनों में ऐसे फंसे हुए हैं कि बाकी सब नजर-अंदाज करते जाते हैं । या शायद जमीर को जरूरतों की चादर तले दबा दिया है । आप्ने बहुत अच्छी अभिव्यक्ति की है । बहुत बडिया ।

Comment on this comment

बहुत अच्छी कविता लिखी है आपने जीवन की सच्चाई को इंगित करती हुई !

Comment on this comment

jab mai pad raha tha to mai mujhme nahi tha
yehi khasiyat hai apki ki reader ko door le jata hai aur
sochne ko majboor kar deta hai
sach me maja aa gaya

Comment on this comment

shabd nahin hain kuch kehne k liye….

Comment on this comment

Leave a comment

(required)

(required)

(Press Ctrl+G to toggle between English & Chosen Indian language)