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कुछ तो पिला दे

नोट – कविता के साथ नोट लिखना मुझे पसंद नहीं. लेकिन ये जरूरी है. अभी रात के एक बज रहे हैं. सो ये रचना बड़ी ही मस्ती में लिखी गयी है. और उसी मस्ती में मैंने गाया भी है. और कुछ झलके या ना झलके आवाज में मस्ती जरूर झलकेगी. सो, जरूर सुनिये. (बीच बीच में की गयी ढब ढब, मेरे कम्प्युटर टेबल से निकली ध्वनि है. गाने के पहले अभ्यास नहीं किया गया है.) अपने मंतव्य जरूर दें.

 

रे साकी बहुत ही प्यासा हूँ बैठा
कुछ तो शरम कर, कुछ तो पिला दे

तेरे करम से ये गमगीन सारे
ये मिट्टी के प्याले, में अमृत गिरा दे.

तेरे ही पहलू में मर जाऊँगा मैं
पर उसके पहले, इक पल जिला दे.

ये रात की सुर्खी, दिल को जलाये
जरा मय तो बरसा, ये आतिश बुझा दे.

वो काज़ी है कहता कि दोज़ख यहाँ है
उसे क्या पता? मय, ये जन्नत हिला दे.

मेरी तन्हाइयों का भी ये कहना
कि अच्छा उन्हें भी लगे पीते रहना

उनको भी अपने सनम से मिला दे
कुछ तो शरम कर, कुछ तो पिला दे

6 Comments

विकाश,
बहुत सुंदर कविता और सुनाने का अंदाज भी.
मज़ा आ गया.
ख़ुद बन के साकी, जो तुमने पिलाई,
पीते रहेंगे , पिला दे , पिला दे…..!

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तेरे करम से ये गमगीन सारे
ये मिट्टी के प्याले, में अमृत गिरा दे.
Vikas ji
the words , thoughts, and the way of presentation
marvelous and powerful work from you
loved reading it, and the podcast … wow
regadrs
deep

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vah bhai vah, hum nahi kahege, hame to padh aur sun kar hi nashaa ho gaya, badhaai

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