जीना
यहीं खड़ा था ना?
और उम्मीद भी कुछ ज्यादा नहीं थी.
तो क्या हुआ यदि मेरे झोले में एक मजबूरी और आ गयी.
खाली झोले की बोरियत से अच्छा
तो इस बोझ का पसीना है.
बिन संघर्ष जीना भी कोई जीना है?
चेहरे की लाली को
तपिश बनते देखने के अनुभव का अनुभव
दुःखद सा प्रतीत होते हुए भी
अज्ञान के सुख से तो बेहतर ही होगा.
ज्ञानाभाव में तो हर मैदान, मदीना है.
बिन संघर्ष जीना भी कोई जीना है?
झुके हुए कंधे, तुम्हें ना भाएँ, मुझे तो प्यारे है.
जमीन दिखती रहे, के लिये झुकने की ताकत जरूरी है.
और पैर सीधे पड़ें, के लिये
धरती का दिखना आवश्यक है.
माथे पे बूँदें तुम्हारी होंगी, मेरी नगीना है.
बिन संघर्ष जीना भी कोई जीना है?
टूटे हुए सपनों का चुभन
क्या केवल दुःख देता है? अनुभव क्या है फिर?
टूटने के बाद आँखें क्या आँसू देती हैं? आशा क्या है फिर?
मैं तो दुआ करता हूँ, उनके लिये
जिन्होंने मुझसे सपनों को छीना है.
बिन संघर्ष जीना भी कोई जीना है?
9 Comments
Hmmmm….the questions at the end really make the reader think….this poem epitomises the ternal questions about dreams, failure, hard work and ofcourse, success.
aapki har kaivta mein ye saaf dikhta ahi ki aap jeevan ko kitni gehrai se jeete hi nahin balki padhte bhi ahin….
har pankti aasha aur ummed ka ek naya strot hai…
bahut sashakt abhivyakti…
bahut sunder…
क्या खूब विशय व उस्की अभिव्यक्ति है। आपका उच्चारण भी अति उत्तम है। सुनकर बहुत आनन्द आया। वाकई बिना संघर्श किसी चीज का मोल नहीं बनता।

मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
बहुत खूब, बहुत सुंदर विषय और कविता,
गहन विचार बड़ी ही खूबी से ढले गएँ हैं,
पॉडकास्ट भी उत्तम और प्रभावी है.
कविता पढ़कर और सुनकर बहुत हर्ष हुआ
विकाश जी, बहुत बधाई और धन्यवाद.
“झुके हुए कंधे, तुम्हें ना भाएँ, मुझे तो प्यारे है.
जमीन दिखती रहे, के लिये झुकने की ताकत जरूरी है”.
ऐसी और अनेक प्रभावी पंक्तियाँ, भई वाह !
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Vikash Reply:
December 2nd, 2008 at 9:46 am
आपने जो पंक्तियाँ उद्धृत की वो मुझे भी सबसे अधिक प्रिय हैं. धन्यवाद!
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