| « “चांदनी” | We and you » |
वो फिर से जीत जाता है
कभी रिश्ता कहीं छूटे, कभी वादा कोई टूटे
कभी मैं रूठ जाऊँ या कभी मुझसे कोई रूठे
कभी तकरार की खातिर,
कभी या प्यार की खातिर
वही आँसू भरा नगमा मैं फिर से गुनगुनाता हूँ
वो फिर से जीत जाता है, मैं फिर से हार जाता हूँ
तुम्हारी आँख का आँसू मेरी पलको पे छा जाये
तुम्हारा दर्द सीने का, मेरी किस्मत में आ जाये
तेरे जीवन का हर नश्तर
तुम्हारी राह का पत्थर
मेरे फटते हुए दामन में मैं भरता ही जाता हूँ
वो फिर से जीत जाता है, मैं फिर से हार जाता हूँ
दिल की जो है ख्वाहिश कभी पूरी ना कर पाऊँ
कभी किस्मत नचाये और मैं नचता चला जाऊँ
कभी जीवन बने उलझन
कभी जीना बने बंधन
जिसे दिल में दबाये होठों से मैं मुस्कुराता हूँ
वो फिर से जीत जाता है, मैं फिर से हार जाता हूँ
कभी वो पास होता है तो फिर अहसास होता है
कि चाहे कुछ भी हो जाये मनुज तो दास होता है
मेरा अधिकार झूठा है
और ये संसार झूठा है
कोई सच मिल ही जायेगा, यही सपना सजाता हूँ
वो फिर से जीत जाता है, मैं फिर से हार जाता हूँ
4 Comments
बहुत सुंदर, मन लुभावनी, कविता
और बेहतरीन प्रस्तुती (podcast)
पढ़ने और सुनने में मज़ा आ गया.
लगा, वो जीत कर भी हार जाता है,
और आप हार कर भी जीत जाते हैं,
यूं दोनों ही जीतते रहते हैं …!
कविता कमाल करती रहती है…….!
बहुत सुन्दर, बहुत मन लुभावनी । इसमें कुछ सूफी कुछ romantic सी झलक आती है। सुनना वाकई बहुत अच्छा लगता है।

(1 votes, average: 4.00 out of 5, rated)
मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
Very nice poem.
Comment on this comment