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दुनिया का बाज़ार……!

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Hindi Poetry

duniya-bhara-bazar-hai-abt1

The world seems to be believing & fast heading towards a situation where apparently everything will be available at a price to be paid and no scruples; entirely a materialistic world & living; & with concept of heaven & hell, abandoned. This is a gazal type Hindi Song, composed pondering on this situation.

दुनिया का बाज़ार……!

 

दुनिया  भरा  बाज़ार  है,   यहाँ  बिक  रही  हर  चीज़  है,
ख़ुद का  भी  बिकना  यहाँ,  अब,  आ  गया  नज़दीक  है…
दुनिया  भरा  बाज़ार  है……….!

कोई  भी  तुम  चीज़  ले  लो,  चाहे  पाक  उसूल  भी,
सब  पे  कीमत  सी  लगी  है,  बोली बस  होने को  है,
ख़ुद का भी  बिकना  यहाँ,  अब,  आ  गया  नज़दीक  है….
दुनिया  भरा  बाज़ार  है……….!

उन  उसूलों   को  जो  मैंने  पाले  थे  अबतक  सही,
उनकी  होली  सज  चुकी  है,  अब  सुलगने  ही  को  है….
ख़ुद का भी  बिकना  यहाँ,  अब,  आ  गया  नज़दीक  है….
दुनिया  भरा  बाज़ार  है ……..!

ये  ज़माना  है  नया,   मजहब  नए  हैं  आज  सब,
पैसा  ही  अल्लाह  है,   अल्लाह  भी  बिकने  को  है…
अब तो ख़ुद को बेचना भी,  आ गया नजदीक है……!
दुनिया  भरा  बाज़ार  है ……..!

ना  सकें  हैं  रोक  हम,   दुनिया  की  इस  रफ़्तार  को,
चल  पड़ी  जहन्नम   को  ये,   जन्नत  भी  अब  रोने  को  है,
अब तो क्या है सोचना, सब आ गया नज़दीक है…..!
दुनिया  भरा  बाज़ार  है………..!
यहाँ  बिक  रही  हर  चीज़  है……….!

” विश्व नन्द “

13 Comments

  1. Parespeare says:

    nowadays shopping can be done by sitting at home through the internet or television has channels like homeshop18, even the neighborhood shops have home delivery service
    -:)

  2. medhini says:

    The earth has become a business world
    where shopping goes on and on.We get a
    realistic picture of the above fact through
    this poem. Well said.

  3. sangeeta says:

    Once again, kudos to you, Sir. Your poetic creations are beyond ratings !
    कलयुग के इस बाजार का व इंसानओं के गिरते मूल्यों का बहुत सही तथा सोचने पर मजबूर करने वाला िचत्रण ।

    कलयुग के इस बाज़ार मे, जह्ाँ बिक रही हर चीज़ है,
    सस्ता केवल आदमी और उसके मूल्य हं,
    और उससे भी सस्ता उसका खून है,
    जो गोली-बमबारी में बहता भरपूर है ।

    • VishVnand says:

      Thank you very much,Sangeeta ji, for your valued comments on the poem.
      The problem is that even founding values are as if being purchased with money power & greed, which is ultimately going to recoil very badly on the very existence of society & mankind. Lets hope, some way, better sense will prevail.
      Am seeing you & your comment on p4poetry after a lapse of quite some time. Welcome.

  4. kalawati says:

    ना सकें हैं रोक हम, दुनिया की इस रफ़्तार को,
    चल पड़ी जहन्नम को ये, जन्नत भी अब रोने को है,
    अब तो क्या है सोचना, सब आ गया नज़दीक है…..!
    दुनिया भरा बाज़ार है………..!
    यहाँ बिक रही हर चीज़ है……….!

    bilkul sahi farmaayaa sir aapne.

  5. sushil sarna says:

    ख़ुद का भी बिकना यहाँ, अब, आ गया नज़दीक है…
    Resp.V.Anand ji, bahut hee sunder panktee,hakeekat ko byaan krtee drpen see linain.is bazar main kabhee kabhee yeh kehna prta hai –

    “paseena mout ka mathe pe aaya, aina laao
    hm apnee zindgee kee aakhree tsveer dekhenge” in brief in short atee sunder.

  6. krishna says:

    Well written…

    Money,money,money
    its so funny i a rich man’s world….
    – ABBA
    Money is all mostly matters whether we like it or not…

    • VishVnand says:

      Thank you krishna,
      Money is not funny,
      In the world of today, talking/doing anything else which is not money or connected with money, is supposed to be useless, waste of time & funny.

  7. sonal says:

    A very nice poem Sir.
    aapne apni is kavita me aaj ki duniya ki bahut sahi tasveer dikhayi hai.kyunki aaj ki duniya me rishtey-nate,imaan,majhab sab kuch bikta hai.

    regards
    sonal.

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