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*** एक सुलगता सच…***

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Hindi Poetry

जिनको सजानें में हमनें ख़ुद को सजा दी
क्योँ  अब तक हमें वो सजा न सके
गाडी बुलाई और लिटा दिया हमको
वो कंधा भी हमको लगा न सके
नहीं कोई शिकवा जमाने से हमको
हम जमाने का दस्तूर निभा न सके
हम समझते रहे उम्र भर जिनको अपना
आख़िरी वक्त वो हमें अपना न सके
जिनको सजानें में हमनें ख़ुद को सजा दी
क्योँ  अब तक हमें वो सजा न सके ,क्योँ  अब तक हमें वो सजा न सके ……

sushil sarna

2 Comments

  1. VishVnand says:

    सुशील जी, बहुत खूब.
    यही सुलगता सच है,
    Very nice sensitive poem.
    मैं तो यूं कहूंगा, ज्यादातर ….
    “जिनको सजानें में हमनें ख़ुद को सजा दी
    फिक्र नहीं अब तक हमें वो सजा न सके,
    पर आज तक वो बेवजह हमें ही क्यूँ,
    इसकी जैसे सजा ही देते रहे.”
    Of course there are very loving exceptions,
    who never forget any obligations

  2. medhini says:

    Sweet, short and beautiful.

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