‘अजन्मी–THE UNBORN DAUGHTER’
प्यारी बेटी तुम्हारी चिट्ठी मिली
पूछा है तुमने तुम बन कर कली
क्युँ ना खिली ।
क्युँ ना मैंने तुम्हे अपना सहारा बनाया
क्युँ ना नन्ही आँखों में कोई सपना सजाया ।
क्युँ ना ये स्वप्निला संसार दिखाया
क्युँ जागने से पहले ही सदा के लिए सुलाया ।
प्यारी बिटिया,
जानती हूँ तुम्हारा आक्रोश बिल्कुल सही है ।
तुम्हारे ना होने में तुम्हारा दोष ज़रा भी नहीं है ।
तुम्हे तुम्हारा आकाश कैसे दुँ बिटिया
जबकि मेरे पैरों तले ज़मीन ही नही है ।
तुम तो फिर भी कह रही हो
मैं तो कह भी न पाई थी
अपने बाद भाई को लाऊँगी इस शर्त पर
दुनियाँ में आई थी ।
खुद आ कर यहाँ माँ को दोषी किया था ।
दादी ने तो देखते ही मुँह फेर लिया था ।
लङकियाँ ही पैदा करती है ये लाँछन भी दिया था।
पापा के expressions तो देख ही ना पाई
कितनी फीकी थी वो बधाई कि
अच्छा फिर लक्ष्मी आई ।
अम्मा को maternity leave के बाद
फिर नौकरी पर जाना है ।
बस यही फिक्र कि लङकी जात
छोङुँ कहाँ कितना खराब ज़माना है ।
नौकर से भी डर, पङोसियों से भी डर
क्रच में भी छोङुँ तो छोटी है ये ही फिक्र
जैसे तैसे एक आया का हुआ इन्तजाम
जिसने मेरे बचपन को किया तमाम ।
पङोसी की किसी लङकी को किराएदार ने कुछ कह दिया था
सो माँ ने हमारा कहीं भी जाना बैन कर दिया था
लङकों से खेलना तो बिल्कुल मना था
बङी होती जा रही हो सदा ये ताना सुना था ।
अपनी मर्जी से अपने subjects भी ना ले पाई
L.L.B. करनी थी पर science दिलाई
डॉक्टर बन गई तो जीवन सुधर जाएगा
वकील बनी तो कोई मुश्किल से ब्याहेगा ।
सदा दुसरों के फैसलों को मान देती रही
एक दिन मेरा भी होगा यही सोच कर सहती रही
मुझे भी कभी आजादी होगी मैं भी खुद सोच पाँऊगी
अपने मुट्ठी भर आसमाँ को अपने चुने तारों से सजाऊँगी
पर ये कभी हो ना पाया
ना कभी आसमाँ मिला ना सजाया ।
किसी चैनल ने अभी एक न्यूज़ दिखाई है
नौ महीने की लङकी झाङियों में पाई है ।
नैना साहनी को भूले थे कि मधुमीता सुर्खियों में आई
जेसिका और आरूषि की तो अभी तक चल रही सुनवाई ।
तेरे और मेरे में एक जेनरेशन का फर्क है
पर बिटिया लङकियों के लिए तो यहाँ आज भी नर्क है ।
आज भी मेरा सहमा सहमा सा व्यक्तित्व है
कलम भले ही कहे पर मन अन अभिव्यक्त है
ऐसी ही बौनी, अभिशप्त, अपाहिज सी
जिन्दगी है तुम्हे देने के लिए
तुम चाहोगी क्या
नहीं ना
तो फिर ज़रा रुक कर आना
नारी शक्ति, महिला आरक्षण, नवजागृति बङे
नये नये शब्द आ रहे हैं जमाने में
अगर कुछ मेरे हाथ भी आया
धूप का वो टुकङा गर मेरे आँगन उतर आया
तो मैं तुझे बुलाऊँगी
जो मुझे ना कभी मिला वो आसमाँ तुझे दिलाऊँगी
फिर तु आना
पर देख आने से पहले
चिट्ठी जरूर लिखना ।
तुम्हारी माँ
18 Comments
बहुत सुन्दर रचना- दिल छूने वाली.Reminds me of a book i read years ago …A letter from a child never born
Touching to the core…
so beautifully expressed and so very true – a curse still prevalent in many parts of India. Its illiteracy and traditions that’s been followed for ages. Thank God women can vote, contest elections, be a doctor and an engineer. In fact we have so many women in such high posts that down the line many men are subordinates. There are women Pilots, managers,CEOs, Army officers and so on and so forth.
Times are changing and there will come a time when guys will sit at home and women would work. A total role reversal.
Thank God Sati is dead, dowry system is on the verge of extinction, women get equal opportunities in all fields. Its just a matter of time. All would be fine and a girl born would be equally celeberated as their couterparts.
‘तुम्हे तुम्हारा आकाश कैसे दुँ बिटिया
जबकि मेरे पैरों तले ज़मीन ही नही है ।’
दिल छूने वाली रचना
बधाई !
बहुत ही सुन्दर ॑ दिल को अन्दर तक छू गई । सच है आज भी मिट्टी में रुल रही है लडकी और औरत ही शोशण भी कर रही है, जरा भी जाग्रिती आ जाये तो जिन्दगी ही कुछ और हो। बहुत बधाई हो।
बहुत ही सुंदर रचना पूनम जी, बधाई हो. “बेटी को मत मारो तुम सब” नामक मेरी कविता में मैंने भी कुछ इस विषय पर लिखने का प्रयास किया है
this poem deserve something more than ‘posted appreciation comments’
I m seriously thinking in this direction…all claims of women empowerment are bleak & lack will power or honest intentions..

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Master of vety. science & working as surgeon. Am a famous radio jokey of AIR Hisar FM. Fond of writing poems and stories, making paintings. Mom of a naughty and dashing son 'SHINOY'.
http://sookoon-e-rooh.blogspot.com/
adbhut…bahut sundar……no words…..
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